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गुरू पूर्णिमा

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गुरू पूर्णिमा

चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को,समर्थगुरू रामदास द्वारा शिवाजी महाराज कोतराशा जाना, गुरू रामकृष्ण परमहंस द्वारा नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) के रूपमें निखारा जाना। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समक्ष हैं जिनके द्वारा इस देशव समाज को समय-समय पर नेतृत्व व मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

यंद्यपि आज के समय में गुरू शिष्य परम्परा लुप्तप्रायः हो चुकी है। परिणामस्वरूप विद्यालयों-महाविद्यालयों में धनराशि देकर पढ़ने वाले छात्रों के मन मेंअपने गुरूओं के प्रति एक साधारण नौकर से अधिक सम्मान या भाव पैदानहीं होता। प्राचीन भारत में गुरू वर्ग के प्रति जो दृढ़ व अपार श्रद्धा का भावशिष्य के हृदय में होता था वह आज भी हमारे लिये गौरव का विषय है।इनका स्मरण हमारे मनों में तपोनिष्ठ सभ्यता की कल्पना जगाता है, जहांआज की तरह विद्या व्यवसाय नहीं होता था। जिसमें निर्धनता के कारण कोईविद्यार्थी शिक्षा से वंचित नहीं होता था, जिसमें राजा-रंक का भेदभाव नहींहोता था। एक वृक्ष के नीचे कुशा-आसनों पर बैठ कर सभी विद्यार्थियों कोएक साथ विद्याध्ययन कराया जाता था।

“सादा जीवन उच्च विचार” गुरू कुल का मूल मंत्र होता था। तप और त्यागजिसका पवित्र ध्येय होता था। लोकहित में जीवन उत्सर्ग की शिक्षा आदर्शपाथेय था। इन गुरूओं की छत्रछाया में ही निकले कपिल, कणाद, गौतमपाणिनी,शंडर अपने वैदुष्यपूर्ण व्यक्तित्व से आज भी वैश्विक पटल पर धुवतारेके समान प्रकाशमान है।

कबीर, तुलसी, मीरा, नानक आदि ने गुरू महिमा के बारे में पर्याप्त साहित्य लिखा है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा का प्रारम्भ ही गुरू वन्दना से करते हैं:-

“श्री गुरू चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार”

वहीं कबीरदास जी कहते हैं:- 

गुरू गोबिन्द दोउ खड़े, काके लागूँ पॉय | बलिहारी गुरू आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय।।

इस सामाजिक पर्व के प्रति आज  व्यक्ति समाज उदासीन है, यह अत्यन्त दुःखका विषय है,प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे उपयोगी और महत्वपूर्ण पर्व की पुनः स्थापना का सद्भाव मन में जागृत कर भारत में सद्शिक्षा के प्रचार-प्रसार मेंअपनी नयी पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करना सनातन परंपरा में योगदान होगा। जयतु संस्कृतम्‌-जयतु भारतम्‌ |

 

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