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प्राचीन- अर्वाचीन बालभारत एवं पं. नेहरू

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प्राचीन- अर्वाचीन बालभारत एवं पं. नेहरू

Baal-diwas

पं. जवाहर लाल नेहरु को बच्चों के साथ रहना और संवाद करना बहुत प्रिय था। बच्चों के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें चाचानेहरू का मधुर सम्बन्ध प्रदान किया। बच्चों के भीतर मौजूद सरलता, सच्चाई, मृदुता, निष्कपटता बच्चों को दुर्लभतम आत्मीय स्वरूप में बनाए रखते है। किलकारी भरते, दौड़ते, कूदते, खिलखिलाते, आगे बढते बच्चे किसके हृदय को आकर्षित नहीं करते। वातावरण, परिस्थिति, समाज और सभ्यता के संस्कार व प्रशिक्षण उनके व्यक्तित्व पर परतें चढ़ाने का कार्य करते हैं। बचपन के संस्कार भविष्य के संसार को आकार देते हैं।

बचपन जिंदगी का वह अनमोल समय है जिस पर भावी जीवन का विकास और विस्तार निर्भर करता है। बचपन की आधार भूमि और नींव पर ही भविष्य का व्यक्तित्व खड़ा होता है। बच्चों का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास करना किसी भी परिवार, समाज और राज्य का प्राथमिक उत्तरदायित्व है। भावी पीढ़ी के स्वरूप पर ही वर्तमान पीढ़ी का भविष्य तय होता है इसलिए बच्चों की परवरिश के द्वारा कोई भी समाज अपने ही मूल का पोषण करता है।

भारतीय परंपरा में, लोक और शास्त्र दोनों ही जगह यह मान्यता है कि बाल्यावस्था के संस्कार में भविष्य के सृजन और विध्वंस दोनों की संभावनाएं निहित होती हैं। हमारे प्राचीन पौराणिक आख्यानों में ऐसे अनेक उदाहरण है जहां शैशव और बाल्यावस्था में भविष्य की झाँकी के दर्शन होते हैं। राम, कृष्ण, बलराम, हनुमान, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, दुर्योधन, दु:शासन, ध्रुव, प्रह्लाद, सुदामा, गणेश, कार्तिकेय, शुकदेव, दौष्यन्ति भरत के बचपन से उनका भविष्य दृष्टिगोचर होता है। प्राचीन भारतीय आयुर्विज्ञान में शिशु एवं बाल स्वास्थ्य के लिए कौमारभृत्य आदि वैज्ञानिक शास्त्र विकसित हुए। बच्चों के आरोग्य हेतु आयुर्वेद में अनेक प्राकृतिक प्राशन, अवलेह विकसित हुए। ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि सर्वसुलभ औषधियाँ बच्चों को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक पोषण में सहायता करती हैं।

 

आधुनिक भारत में बच्चों की शिक्षा, पोषण और विकास को लेकर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने व्यापक चिंता प्रकट की। उन्होंने मातृ एवं शिशु कल्याण के लिए, बाल्यावस्था और कुमारावस्था में बच्चों के संपूर्ण विकास और पोषण के लिए अनेक योजनाएं संचालित की। पंडित नेहरू का विश्वास था कि बच्चों का समुचित शिक्षण और पोषण ही भविष्य के समाज और देश को मजबूत बना सकता है। नेहरू जी की जीवनी और साहित्य में, विशेष रूप से उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा जी को जो पत्र लिखें उनमें व्यक्तित्व विकास के महत्वपूर्ण सोपान प्रदर्शित हुए हैं। सत्य, अहिंसा, लोकतांत्रिक मूल्यचेतना, समावेशी चिंतन, गौरवपूर्ण परंपराओं के प्रति आत्माभिमान आदि सद्गुणों की प्रतिष्ठा बचपन में संभव होती है। इस धरती और मानवजाति के संपूर्ण स्वास्थ्य और सौंदर्य को सदैव के लिए बनाए रखने हेतु हमें बचपन से ही प्रयत्न करने पढ़ते हैं ।

 

पंडित नेहरू ने 1953 में भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना में, भोर कमेटी की अनुशंसा पर भारत में सर्वत्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की जहां प्रत्येक बच्चे को जन्म के समय बीसीजी का टीका लगाने की नीति का क्रियान्वयन किया गया। नेहरू जी के समय में ही स्मालपॉक्स या बड़ीमाता का टीका विकसित किया गया जो बाद में राष्ट्रीय टीकाकरण मिशन में शामिल हुआ। बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए नेहरू जी की चिंता का परिणाम था कि इस टीकाकरण के फलस्वरूप 1978 में हमारा देश स्मालपॉक्स से मुक्त घोषित हुआ।


नेहरू जी विद्यार्थी जीवन में बच्चों के स्वास्थ्य और चरित्र निर्माण को लेकर अत्यंत सजग थे। उन्होंने द्वितीय पंचवर्षीय योजना की समाप्ति के दिनों में डब्ल्यूएचओ-यूनिसेफ के सहयोग से राष्ट्रीय विद्यालय पोषण योजना (नेशनल स्कूल न्यूट्रिशन प्रोग्राम) शुरू करवाया जिसमें बच्चों को स्कूल में सूखा दूध वितरित किया जाता था।


नेहरू जी जानते थे बालभारत ही भविष्य का भारत है इसलिए इसका समग्र पोषण होना आवश्यक है। नेहरू जी ने तीसरी पंचवर्षीय योजना में नेशनल स्कूल अनुशासन कार्यक्रम शुरू करवाया जो देशभर के विद्यालयों में छात्रों में चरित्र निर्माण और अनुशासन के व्यापक मूल्य को प्रतिष्ठित करने वाला था। इसके लिए स्कूलों में एनडीएसआई (नेशनल डिसिप्लिन सर्विस इंस्ट्रक्टर) का पद सृजित किया गया जो कालांतर में विलोपित हुआ तथा जिसका कार्य स्कूलों में पीटीआई करने लगे। नेहरू जी ने ही स्कूल, कॉलेजों में नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) कार्यक्रम शुरू किया।


बड़ों की ओर से बच्चों को निरंतर प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए इसके लिए नेहरू जी ने देश में बाल दिवस मनाना प्रारंभ किया। बच्चों को भारतीय राष्ट्रीय दिवसों पर वीरता पुरस्कार से सम्मान करने की परंपरा भी नेहरू जी ने विकसित की। वे जानते थे कि श्रेष्ठ समाज के निर्माण के लिए बच्चों में वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता तथा ज्ञानप्राप्ति की निरंतरता आवश्यक है। 1946 में लिखी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में नेहरू जी ने साइंटिफिक टेंपरामेंट को परिभाषित किया था जो बाद में 1976 हमारे संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य में शामिल हुआ । भारत के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक सोच, मानववाद, ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।


पं. नेहरू के जाने के बाद बालदिवस बच्चों के प्रिय चाचा नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को मनाया जाने लगा। इस दिन हम भारतीयों का यह कर्तव्य है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को समग्र स्वास्थ्य व पोषण देने के साथ उनमें शिक्षा-दीक्षा से कौशल और दक्षता का विकास करें। बच्चों के चरित्र में उन सार्वभौम मूल्यों की प्रतिष्ठा करें जो ज्ञान-विज्ञान-दर्शन से प्रेरित-विकसित मानवीय समाज और देश के निर्माण में उनकी भूमिका तय करें।

 

संदर्भ-

प्रो. एस. के. कटारिया (अध्यक्ष, समाजविज्ञान संकाय, मो.ला.सु. विश्वविद्यालय के साथ विमर्श)

प्रो. नीरज शर्मा

अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
मो. ला. सु. विश्वविद्यालय, उदयपुर
neeraj.sanskrit@gmail.com

Comment (1)

  1. डॉ. रोहिताश्व यादव

    Very Nice

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