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पिता मूर्त्ति: प्रजापते

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पिता मूर्त्ति: प्रजापते

आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर

भारतीय संस्कृति सदा से उच्च आदर्शों और संस्कारों की पोषक संस्कृति के रूप में जानी जाती है। इन्हीं आदर्शों और संस्कारों का प्रथम पोषक होता है, परिवार। परिवार, जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व की पहली पहचान अपने नाम को पाता है। वह नाम जो उसे मिलता हैं अपने वंश से, अपने कुल से और सबसे महत्त्वपूर्ण अपने पिता से। पुराणों में कहा भी गया है-

पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परमं तप:।

पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वेदेवता:॥

                  – पद्मपुराण, स्कन्दपुराण

      वस्तुत: पिता शब्द को व्याख्यायित करने हेतु अनेक काव्य, गीत, साहित्य आदि की रचना हुई है, तथापि एक पुत्री के रूप में ‘पिता’ की व्याख्या करना सूर्य को प्रकाश दिखाने जैसा है। अप्रतिम बुद्धि के धनी, चाणक्य ने कहा था-

जनकश्चोपनेता च

 यश्च विद्यां प्रयच्छति।

अन्नदाता भयत्राता

पञ्चैते पितर: स्मृता।।

                        – चाणक्य नीति

किन्तु, मैं ये समझती हूँ कि ‘पिता’ शब्द को किसी परिभाषा या शब्दावली में बांधा नहीं जा सकता। ‘पिता’ भावों से भरा वह हृदय है, जो माँ की ममता को सजाने वाला आँगन है। ‘पिता’ वह लौह चट्टान है,जो बिन आह के उस हर दर्द को सहता है, जो उसकी संतति को आहत करने का प्रयास करती है। पिता वह मजबूत ढाल है जो परिवार पर आने वाले हर संकट को अपने ऊपर हंसते-हंसते सहन करता है। पिता वह मनुष्य है, जिसके हृदय की हर धड़कन उसकी संतान की श्वांस पर चलती है।

       प्रत्यक्षः विघ्नहर्ता पिता।

            जिस प्रकार जन्म के साथ ही माँ का परिचय प्राप्त होता है, उसी प्रकार पिता का भी परिचय मिले, ऐसा तो ईश्वर ने संयोग ही नहीं बनाया, किन्तु जन्म के बाद जीवन के प्रत्येक सोपान पर हमारा परिचय पिता द्वारा ही निर्मित किया जाता है। यह सत्य है, कि एक माँ ही सन्तान को नौ माह गर्भ में पालती है, किन्तु वह पिता ही है, जो आजीवन सन्तान की प्रत्येक आकांक्षा, कामना, आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करने के लिये अपने अस्तित्व का भी क्षरण कर देता है।

माता गुरुतरा भूमे, पिता चोच्चतरं च खात्।

                                    – महाभारत

एक पिता के रूप में मनुष्य की हस्ती गुरूता को प्राप्त कर लेने पर भी विनम्रता के गहन सागर की चट्टान के समान हो जाती है, जो सागर की लहरों के थपेड़ों से टकराकर, अपना क्षरण होने पर भी खुद पर पल्लवित शैवाल को जीवित रखती है। एक परिवार में पिता की भूमिका ही ऐसी है, कि कोई भी उसके भावनात्मक पक्ष को तब ही समझ पाता है, जब वह स्वयं उस भूमिका का निर्वाह करता है।पिता का प्यार और उनकी परवाह को समझने के लिए एक उम्र का अनुभव करना पड़ता है। उनकी व्यावहारिकता और समझ तब समझ आती है जब दुनिया से हमारा साक्षात्कार होता है। वस्तुत: यही कारण है कि पिता के रूप में मनुष्य के स्वभाव में गांभीर्य, धैर्य, सख्ती और अनुशासन का भाव आ जाता है। पिता कभी अपने मन की कहते नहीं और पुत्री के सन्दर्भ में तो पिता के व्यवहार की अंतरंगता  अत्यन्त विचित्र है। पुत्री के लिए पिता रक्षात्मक भाव से भरा होता है,किंतु उनके भीतर का ये योद्धा कभी पुत्री के सामने नहीं आता। 

पिता उम्मीद की किरण,आशा का अहसास है।

परिवार की हिम्मत है, बच्चों का विश्वास है॥

दिखने में है सख्त पर भीतर बहुत नर्म है।

पिता के हृदय में छिपे जाने कितने मर्म हैं॥

पिता संघर्ष की आंधी में हौंसले की ढाल है।

जीवन की विपत्ति से लड़ने को दोधारी तलवार है॥

पिता सपने दिखाने वाले सितारों का आसमान है।

सपनों को पूरा करने वाले विश्वास की पहचान है॥

किस्मत अगर मां है तो, पिता कर्म की जान है।

विश्वशिखर पर हमें देखना ही जिसका अरमान है॥

पिता ही ज़मीर,पिता ही जागीर,पिता ही तक़दीर है।

पिता की समझ को जो समझे वही सबसे अमीर है॥

यूं तो ईश्वर ही है संसार का जनक, पालक और संहारक।

पर पिता के रूप में हमारे समक्ष ईश्वर सशरीर है॥

वास्तव में पिता शब्दों से कम और व्यवहार से ही अधिक सिखाते हैं। शायद इसीलिये हर सन्तान जीवन के उच्च सोपानों पर बेहद गर्व से कहती हैं- ”हमारे पिता ने सिखाया है।’’ ये चार शब्द ही व्याख्या हैं, उस चरित्र की जो जन्म देने वाले जनक से संस्कार देने वाला अभिभावक, जो ज्ञान देने वाले गुरु से चरित्र निर्माण करने वाला मार्गदर्शक और जो फूलों की तरह अपने हाथों में रखकर पाली गई पुत्री के लिये ‘बाबुल’ बन जाता है।

शरीरकृत प्राणदाता

यस्य चान्नानि भुंजते।

क्रमेणेतेलेयोऽप्युक्ता:

पितरो धर्मशासने।।

भारतीय समाज या संस्कृति का ढांचा कुछ ऐसा है, जहां स्त्री, नारी अथवा मां को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, किन्तु ‘पिता’ ही वह आदर्श है, जहाँ पुरुष ने प्रकृति से भी ऊपर का स्थान प्राप्त किया। अन्य शब्दों में एक पुरुष अपने जीवन की पूर्णता प्राप्त करता है, जब वह पिता बनता है; क्योंकि एक पिता के रूप में ही मनुष्य अतिकोमल और अतिकठोर दोनों विपरीत विशेषताओं को एक ही समय में धारण करता है। फिर भी पिता के हिस्से में संतान का उत्साह युक्त प्रेम नहीं आता, क्योंकि संतान के रूप में पिता के अतिकोमल हृदय को समझना कठिन होता है।  इसीलिये वेदों में कहा गया है-

पिता मूर्ति: प्रजापते।

अर्थात् पिता पालन करने वाला होने के कारण प्रजापति अथवा ईश्वर का ही मूर्तिमान रूप है। उक्त पालन का अर्थ सिर्फ भौतिक नहीं अपितु मानसिक, चारित्रिक संस्कारिक, हार्दिक और आत्मिक पालन से भी है। तभी तो कहा गया है-

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।

मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥

                        – पद्मपुराण

                  (सृष्टिखण्ड, अध्याय-47)

वहीं गरूड़ पुराण में पिता के अतुलनीय व्यक्तित्व को नमस्कार करते हुए कहा गया है-

पितृन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्ये देवलोकेऽथ महीतलेवा।

तथान्तरिक्षे च सुरारिपूज्यास्ते वै प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम्॥

 

पितृन्नमस्ये परमार्थभूता ये वै विमाने निवसन्त्यमूत्र्ता:।

यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभिर्योगीश्वरा: क्लेशविमुक्तिहेतून्॥

पितृन्नमस्येदिवि ये च मूत्र्ता: स्वधाभुज: काम्यफलाभिसन्धौ।

प्रदानशक्ता: सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु॥

     – गरूड़ पुराण

             (आचार खण्ड, अध्याय-89)

      वस्तुत: पिता को परिभाषित करना स्वयं विधाता के लिये भी असम्भव है तथापि अपने शब्दों के माध्यम से मेरे जीवन में पिता की भूमिका को परिभाषित करने का एक प्रयत्न आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ-

मेरे पापा

चिराग बुझे तो रोशनी आप बन जाते हो,

नींद टूटे तो ख्वाब आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

दिल टूटे तो धड़कन आप बन जाते हो॥

नदिया छूटे तो किनारा आप बन जाते हो,

गम हो तो खुशियों का दामन आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

राह छूटे तो साथी आप बन जाते हो॥

उम्मीद डगमगाये तो भरोसा आप बन जाते हो,

मुसीबतों के कहर में आशियाना आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

आँसुओं के सैलाब में हँसी का बहाना आप बन जाते हो॥

सागर की उफनती लहरों में साहिल आप बन जाते हो,

अँधेरी रात में चमकता चाँद आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

जिन्दगी के हर सवाल का जवाब आप बन जाते हो॥

उजड़े चमन के लिये बादल आप बन जाते हो,

घने सवेरे के लिये सूरज आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

खुदा से कुछ माँगे तो सबसे पहली दुआ आप बन जाते हो॥

आशाओं की सीप का मोती आप बन जाते हो,

नाकामी में कामयाबी की सीढ़ी आप बन जाते हो,

हमारी तकदीर का सबसे रोशन नूर हो आप,

गमों की बरसात में इन्द्रधनुष आप बन जाते हो॥

डॉ. मेघा शर्मा

सहायक आचार्य (सुप्रीम फाउंडेशन)
राजकीय धूलेश्वर आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, मनोहरपुर।
पूर्व प्राचार्य, दादू महाविद्यालय, जयपुर।

Comments (8)

  1. Priyanka sharma

    Very nice blog🙏🙏🙏🙏

  2. Er. Hemant Kumar Sharma

    बहुत ही उत्कृष्ट और सराहनीय कविता 👍🙏

  3. PRAVEEN PANDYA

    बहुत खूब। बधाई मेघा जी

    1. Prof Govind sahay shukla

      अभिनंदनीय।।

  4. Kushla Pathak

    Wonderful write up

  5. Er. Hemant Kumar Sharma

    बहुत ही उत्कृष्ट और सराहनीय पंक्तियां।👍🙏

    1. Suraj Bhan Sharma

      Wonderful blog 👍

  6. Kirti Modi

    Superb Blog is so appreciated!!!

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