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पूर्णता-पूर्णिमा ही गुरु

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पूर्णता-पूर्णिमा ही गुरु

Guru Purnima

गुरु कौन हैं ? इसकी बड़ी चर्चा पूरे संसार में होती रही है। संसार के प्रत्येक देश में प्रत्येक व्यक्ति गुरु बनना चाहता है। होड़ गुरु बनने की है, शिष्य बनने की नहीं। भले ही गुरुता का महामार्ग शिष्यता है। जो कोई शिष्य बनता है, वह गुरु बनने की चाह में। तुच्छ से तुच्छ पदार्थ से लेकर महान् से महान् पदार्थ तक गुरुता का निर्धारण किया गया है। जो पहले जन्मता है, वह अपने से पीछे जन्मने वाले का गुरु है। यह गुरुता का एक स्तर है। जिसके पास अधिक पैसा है, वह अपने से कम पैसे वाले का गुरु है। आयु एवं वित्त गुरुता के आधार कहे गए हैं। भारतीय समाज इन्हें स्वीकारता हुआ गुरुता के अन्य विकल्पों को खोजता और पहचानता रहा है। तेजस्वियों की उम्र नहीं देखी जाती है, कहकर यह स्थापित किया है कि उम्र के आधार पर बड़ा होने का मानदंड अवश्य है, किन्तु जहाँ तेजस्विता का विषय आता है, वहाँ उम्र का विचार गौण हो जाता है। तेजोवृद्ध लोगों की वयः समीक्षा न करने  की उक्ति  कवियों ने कही है और यह उनकी मौलिक बात नहीं होकर परम्परा से प्राप्त चेतना का प्रवचन है। अधिकार के भी गुरुता के अपने मानदंड हैं। बालोऽपि राजा नावमन्तव्यः में अधिकार और आयु के बीच तुलना की गयी है। आयु की अपेक्षा अधिकार की गुरुता मानी है। गुरु का एक पर्याय हैः वृद्ध। वयोवृद्ध, वित्तवृद्ध, अधिकारवृद्ध, तपोवृद्ध के बाद ज्ञानवृद्ध आता है। ज्ञान की गुरुता सभी गुरुताओं में बड़ी है। ज्ञान पवित्रतम है। पवित्र करण है पावनता का। व्यक्ति को ज्ञान जितना निर्मल बनाता है, उतना निर्मल और ऊँचा और कोई नहीं बना सकता। प्रत्येक व्यक्ति का अपना गुरु होता है। ज्यों ज्यों व्यक्ति का जीवन ऊँचाई को पाता है, उसके गुरु त्यों त्यों बदल जाते हैं। भर्तृहरि और बाणभट्ट तो बड़ी तीखी भाषा में धन की गुरुता को मानने वाले अपने समाज की आलोचना करते हैं। स्वदेश में राजा एवं विद्वान् की सर्वत्र पूजा होने जैसी उक्तियों में अधिकारगुरुता और ज्ञानगुरुता को आमने-सामने रखा गया है। निचोड़ के रूप में कहें तो आयु, अधिकार, वित्त आदि गुरुओं में ज्ञान परम गुरु है, सबसे बड़ा गुरु है। आयु में बच्चा भी जब त्याग में प्रतिष्ठित होकर संन्यासी हो जाता है तो वह आयु, वित्त और अधिकार में बूढ़े से बूढ़े व्यक्ति के लिए गुरु है। जितनी अपूर्णता होती है, उतना ही अन्धकार होता है। पूर्णता आत्मा में होती है। आत्मा पूर्ण है, वह प्रकाशमय है। वह सबसे गुरु है। अतः गुरु पूर्णिमा है और पूर्णिमा गुरु है। एक व्यक्ति के लिए उसके माता, पिता, बड़े भाई और बहिन, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी, बुआ-फूफा, सास-ससुर गुरुजन हैं। उसके अधिकारी, प्रशासक उससे गुरु हैं। इन सबका वह शिष्य होता है। विद्यार्थी अपने अध्यापक का शिष्य होता है। परन्तु सबसे अधिक शिष्य वह अपनी आत्मा का होता है। वहीं अशेष प्रकाश है।

          गुरुता के प्रति शिष्यभाव और नम्रता मूल्य है। अपने से आयु आदि में बड़ों के प्रति गुरुभाव रखना चाहिए। होता यह है कि एक बूढ़ा आदमी किसी का सम्मान उसके ज्ञानवृद्ध होने का करता है और वह उसकी वयोवृद्धता सम्मान करता है। जब अनेककोटि के वृद्ध एक साथ हों तो प्रथमपूज्य कौन है, इस पर पर्याप्त विचार हुआ है। कौन समाज कितना गुरु है, इसकी पहचान उसकी गुरुता की सीढ़ियों से होता है।

          ज्ञान-परम्परा में जो गुरु अपनी अगली पीढ़ी का निर्माण नहीं कर पाता है, उसे पातकी माना जाता है। अभिनव गुप्त कहते हैं—

न दीक्षेत गुरुः शिष्यं तत्त्वयुक्तस्तु गर्वतः।

योऽस्य स्यान्नरके वास इह च व्याधितो भवेत्।। ३०-२३, तन्त्रालोक

आज बहुत-सी विद्या परम्पराएँ लुप्त हैं या लुप्त होने की स्थिति में हैं तो यह उन उन गुरुओं का आलस्य, अकर्मण्यता और विद्यापरम्परा के लिए कष्ट-सहिष्णुता रूपी तप से रहितता है। आधुनिक काल के महत्त्वपूर्ण संस्कृत कवि डॉ. हर्षदेव माधव के गुरूपनिषद् का एक बन्ध गुरु की अर्थवत्ता के लिए द्रष्टव्य है—

गुरोर्हास्ये/भवति/शिष्यवाष्पबिन्दूनां भाष्यम्। / गुरोर्मौने /भवति/भाषायाः पारं गतानाम् अनुभूतिनां वार्तिकम्/ गुरोः क्रोधे /भवति फक्किका/परमकरुणायाः/गुरोः प्रसादे/ भवति/चिदानन्दस्य कारिका/गुरोः प्रेम्णि/भवति…./आत्मसाक्षात्कार-वृत्तिः/गुरोः सान्निध्यमेवास्ति/अधिकारसूत्रसाम्राज्यम्।

(गुरु की हँसी

लिखती है

शिष्य के रोने के कारणों का

महाभाष्य ।

उनके मौन में बनते हैं

अनुभूतियों को व्यक्त करने में

असमर्थ / नपुंसक वाचाल भाषा द्वारा

उक्त, अनुक्त, दुरुक्त को

दुरस्त करने वाले ‘वार्तिक’ ।

उनका क्रोध तो सचमुच करुणा के अंश अंश को

उद्घाटित करती ‘फक्किका’ है ।

शान्त प्रसन्न गुरुमुख छवि

ज्ञान के

निश्चल-निश्छल आनन्द की

‘कारिका’ है कोई ।

उनके प्रेम में रहती है ‘स्व’ के साक्षात्कार की

‘वृत्ति’ / अनुवृत्ति । गुरु का सान्निध्य

अर्थात् जीवन की हर पगडण्डी में

व्याप्त ‘अधिकार-सूत्र’ । )

डॉ. प्रवीण पण्ड्या

( संस्कृत कवि- आलोचक एवं विद्वान्)

Comment (1)

  1. Subhash Prajapat

    Kishori

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