Blog

पारतंत्र्य के विरोध और स्वातंत्र्य के पक्ष में संस्कृतज्ञों ने जो आंदोलन चलाया, उसके स्मरण की आवश्यकता है…

ब्लॉग

पारतंत्र्य के विरोध और स्वातंत्र्य के पक्ष में संस्कृतज्ञों ने जो आंदोलन चलाया, उसके स्मरण की आवश्यकता है…


Warning: Undefined array key "" in /home/gauravaca/public_html/wp-content/plugins/elementor/core/kits/manager.php on line 323

Warning: Trying to access array offset on value of type null in /home/gauravaca/public_html/wp-content/plugins/elementor/core/kits/manager.php on line 323

आजादी का अमृत महोत्सव

    भारत में अंग्रेजी सत्ता के उच्छेदन के लिए चला लोकमानस—आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। भारत राष्ट्र का स्वाधीनता संग्राम वैदेशिक आंग्ल सत्ता के आधिपत्य के विरोध में था। इसमें देशभक्त स्वातंत्र्यचेता वीरों ने एक ओर सशस्त्र आंदोलन का संचालन किया, वहीं दूसरी ओर अहिंसक सत्याग्रह जैसे प्रभावी आंदोलनों से मातृभूमि के स्वातंत्र्य के प्रति जन—जागरूकता का परिचालन भी किया। प्रचलित मान्यता है कि स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ झांसी की रानी लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे प्रभृति महान् सेनानियों के संघर्ष से 1857 ईस्वी में घटित क्रांति से हुआ। यद्यपि मुगल हुकूमत के खिलाफ सम्राट् पृथ्वीराज चौहान एवं महाराणा प्रताप जैसे समरवीर क्षत्रियों द्वारा जन्मभूमि की रक्षा के लिए अनेक युद्ध लड़े गए पर वे स्वतंत्रता संग्राम जैसे आंदोलन न होकर राज्यविशेष की पराधीनता के कारण विदेशी तथा विधर्मी शासकों के विरुद्ध संघर्ष थे। वहीं 19वीं और 20वीं शती में प्रचलित स्वातंत्र्य—समर की विशेषता थी कि इसमें प्राय: कोई व्यक्ति नहीं बल्कि सभी भारतीयों की जागृत आंतरिक भावना अंग्रेजी पारतंत्र्य को भंग करने के उद्देश्य से प्रस्तुत थी। यह भावना जैसे देश की दूसरी भाषाओं और बोलियों में लिखी और कही गई, ठीक वैसे ही संस्कृत भाषा के साहित्य में भी इस भावना के स्वर सुस्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। इस स्वतंत्रता—संघर्ष से संस्कृत साहित्य का संबंध अनेक प्रकार का है। अंग्रेजों के शासन में भारतीयों ने जिस प्रकार के पारतंत्र्य का अनुभव किया, संस्कृत—साहित्यकारों की रचनाओं में भी वैसा ही निदर्शन प्राप्त होता है। पारतंत्र्य के विरोध में और स्वातंत्र्य के पक्ष में संस्कृतज्ञों—कवियों ने लेखनी चलाई।

                भारत में अहिंसक स्वातंत्र्य आंदोलन का प्रमुखता से नेतृत्व राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी द्वारा अनुष्ठित किया गया। महात्मा गांधी को केंद्र में रखकर संस्कृत भाषा में विपुल साहित्य लिखा गया, जिसका आकलन सहज नहीं है। महात्मा गांधी को केंद्र में रखकर नायकत्वेन वर्णित काव्य, नाटक, गद्यबद्ध—जीवनचरित्रों की संख्या बहुत अधिक है, जिनमें बहुत—से ग्रंथ अद्यापि अप्रकाशित ही हैं, ऐसा शोधार्थियों का अनुमान है। महात्मा गांधी के जन्म—शताब्दी—अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान ने विविध भाषाओं में लिखे गांधी—वाङ्मय के ग्रंथों की एक सूची प्रकाशित की थी। इस सूची में 29 ऐसे काव्यों का विवरण है, जिनमें महात्मा गांधी ही नायकत्वेन वर्णित हैं और उनके स्वातंत्र्य आंदोलन को ही ये काव्य उपस्थित करते हैं। इन ग्रंथों में संस्कृत कवयित्री पंडिता क्षमाराव द्वारा 1932 ईस्वी में प्रकाशित ‘सत्याग्रहगीता’, ‘उत्तरसत्याग्रहगीता’ एवं ‘स्वराज्यविजय:’ नाम के तीन काव्य साहित्य जगत् में सुविदित हैं। जब स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था तब क्षमाराव का ‘सत्याग्रहगीता’ काव्य पेरिस से 1932 में इसलिए छपा था कि उस समय भारत में उस कृति का प्रकाशन करवाना सरल नहीं था। स्वतंत्रता—प्राप्ति के बाद इस काव्य का द्वितीय संस्करण 1956 ईस्वी में मुंबई से छपा। इस काव्य में गांधी की लंदन यात्रा (गोलमेज संमेलन) का रोचक वर्णन है। ‘उत्तरसत्याग्रहगीता’ का प्रकाशन 1948 ईस्वी में हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर महात्मा गांधी के देवलोक जाने तक का वर्णन ‘स्वराज्यविजय:’ में है, जिसका प्रकाशन 1962 ईस्वी में हुआ।

 

                रामानंद संप्रदाय के महान् संत वैष्णवाचार्य स्वामी भगवदाचार्य की काव्य—शृंखला स्वतंत्रता आंदोलन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। भगवदाचार्य स्वतंत्रता संग्राम के पूर्णत: समर्थक थे। इनके लिखे काव्यत्रय संस्कृत साहित्य में खास हैं, ये हैं — भारतपारिजातम्, पारिजातापहारम् और पारिजातसौरभम्। भगवदाचार्य ने ‘भारतपारिजातम्’ में महात्मा गांधी के जन्म से लेकर साबरमती आश्रम की स्थापना तक का इतिहास निबद्ध किया है। भगवादाचार्य ने ‘पारिजातापहारम्’ में भारत छोड़ो आंदोलन का इतिहास और ‘पारिजातसौरभम्’ में गांधी के स्वर्गारोहण तक का वर्णन किया है। देश की आजादी से पूर्व लोकचेतना को जागृत करने वाले काव्यों के प्रकाशन का सौविध्य नहीं होने से ‘भारतपारिजातम्’ का प्रकाशन दक्षिणी अफ्रीका से हुआ।

                संस्कृत कवियों की सूक्ष्म दृष्टि स्वाधीनता के समर के साथ—साथ चल रही थी, जिससे उनकी लेखनी ने सहस्रों पृष्ठ लिख डाले। इन लेखकों में स्वामी भगवदाचार्य जैसै प्रौढ विद्वान् वैष्णवाचार्य थे वहीं क्षमाराव जैसी विदुषी महिलाएं भी सम्मिलित थीं। समस्त भारत में सर्वत्र परिनिष्ठित कवियों द्वारा ऐसा साहित्य प्रणीत किया गया है, जो शनै: शनै: शोधार्थियों के समक्ष प्रकट हो रहा है। गांधी के जीवनकाल में ही उनके जीवन पर 1944 ईस्वी में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में भारतीय भाषा के मूर्धन्य कवियों ने लेख लिख गांधी की प्रशस्ति और उनके द्वारा किए संघर्ष का समर्थन किया। इनमें रवींद्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्यम् भारती, वल्लतौल, सरोजिनी नायडू, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा जैसी कवि—विभूतियां थीं। इस ग्रंथ में भारतप्रसिद्ध 13 संस्कृत विद्वान् भी शामिल थे। इनमें विधुशेखर भट्टाचार्य, महादेव शास्त्री, गोपाल शास्त्री, दर्शनकेसरी नारायण शास्त्री खिस्ते, राव भट्टाचार्य और स्वामी भगवदाचार्य जैसे संस्कृत के महान् कवि—लेखक शामिल थे। लखनऊ से प्रकाशित इस ग्रंथ की भूमिका महान् दार्शनिक सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन् ने लिखी है। स्वयं महात्मा गांधी ने भी इस ग्रंथ में अपना प्रत्युत्तर प्रकाशित किया है। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत पंडितों ने स्वातंत्र्य चेतना का आंतरिक समर्थन उच्च स्तर से किया है।

                स्वतंत्रता से पूर्व ब्रिटिश शासन ने यद्यपि संस्कृत के उत्थान के लिए कई कार्य कर संस्कृत—पंडितों को संतुष्ट करने के भरसक प्रयास किए। पंडितों को ‘महामहोपाध्याय’ की पदवी प्रदान करने के बहाने उनका सम्मान किया जाता था, जिससे विद्वान् उनके तथा उनकी नीतियों के प्रशंसक बन सकें। 20वीं शती के आरंभ में तो योजनाबद्ध तरीके—से पंडितों से अंग्रेजी सरकार की प्रशस्ति करवाना शुरू किया गया, जिससे पंडितों की बात मानकर आम लोग अंग्रेजी शासन का विरोध छोड़ दें। यही कारण रहे कि ‘राजभक्तिप्रकाश:’ और ‘जार्जचरितम्’ जैसे ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखवाए गए। दिल्ली में पंचम जार्ज के दरबार में कुछ संस्कृत विद्वान् भी आमंत्रित किए गए थे। इस अवसर पर 16 दिसंबर, 1911 को दिल्ली में महामहोपाध्याय पंडित बांकेराय नवल गोस्वामी के नेतृत्व में ‘राजभक्तिप्रकाश:’ पुस्तक जार्ज पंचम और महारानी मैरी को समर्पित की गई, जिसमें अंग्रेजी शासन की प्रशंसा की गई थी। उन वर्षों में दिल्ली व उत्तरप्रदेश के कई संस्कृत विद्वानों ने अंग्रेजी शासन के समर्थन में संस्कृत में कई उक्तियां लिखीं। रायबहादुर आदि पदवियों को धारण करने वाले महामहोपाध्याय पंडित बांकेराय नवल गोस्वामी जैसे संस्कृत विद्वानों द्वारा लिखा ऐसा साहित्य प्राप्त है, जो अंग्रेजी शासन से प्रेरित प्रतीत होता है। प्रथम महायुद्ध के समय पंडितों ने मंदिरों में ब्रिटेन की विजय के लिए अनुष्ठान—प्रार्थनाएं की हैं। जयपुर के पंडित चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के नाम से प्रथम विश्वयुद्ध के समय के दो संस्कृत पद्य प्राप्त होते हैं — धर्माय युध्यति चमूर्नृपजार्जभक्ता तस्यै जयं परमकारुणिक प्रयच्छ। (ये पद्य पंडित चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के नाम से भले हों, पर ये उद्गार उनके हृदय से संभवत: ही निकले हों क्योंकि उनके मन में विदेशी शासन के प्रति धिक्कृति थी।)

                महात्मा गांधी के लिए संस्कृत विद्वानों द्वारा जो उद्गार व्यक्त किए गए हैं, उनमें वैदेशिक दासता—पाश से मुक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा है। जयपुर के भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने 1935 से 1940 के बीच ऐसे पद्य लिखे, जो गांधी व नेहरू के दमन के विरोध को व्यंजित करते हैं। एक पद्य है —

नृपतिभवनघूकैरेतकैर्जंजपूकै—

र्निभृतनिगडबद्धान् देशनेतृन् निरीक्ष्य।

नियतमुचितवक्ता वक्तुमीशीत नूनं

मशकदशनमध्ये दन्तिन: संचरन्ति।।

  संस्कृत भाषा सर्वतंत्र—स्वतंत्र विश्वजनीना वाणी है। अत एव भारतीय भाषाओं में स्वातंत्र्य की कामना तथा दासता से मुक्ति के संग्राम का जहां कहीं भी प्रभावी उल्लेख है, वह सम्मोहित करता है। बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘आनन्दमठ’ उपन्यास में ‘वन्दे मातरम्’ शीर्षक से एक गीत लिखा है, जो भारत के इतिहास में अजर—अमर है। यह उपन्यास बांग्ला भाषा में है और इसी भाषा में यह अमर गीत भी लिपिबद्ध है। पूरा उपन्यास बांग्ला में होने के बाद भी संस्कृत भाषा की महिमा को ध्यान में रखते हुए चटर्जी ने इस गीत की पहली पंक्ति और अन्तिम पंक्ति संस्कृत में लिखी और बीच का भाग बांग्ला भाषा में। ऐसा लेखन बंगाल में ही नहीं, महाराष्ट्र में भी हुआ। स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने स्वातंत्र्य—संघर्ष को प्रेरित करने के लिए ‘काला पाणी’ शीर्षक से एक उपन्यास लिखा। सावरकर ने स्वतंत्रता को देवी के रूप में संबोधित कर एक गीत लिखा, जिसकी प्रथम पंक्ति सावरकर ने संस्कृत में ही लिखी — सन्ति स्वतन्त्रते भगवति! त्वामहं यशोयुतां वन्दे। जयोऽस्तु ते श्रीमहन्मंगले शिवास्पदे शुभदे॥

                संस्कृत का प्रथम आधुनिकयुगीन उपन्यास पंडित अंबिकादत्त व्यास द्वारा विरचित ‘शिवराजविजय:’ है, जो स्वातंत्र्य—चेतना पर आधारित है। इसमें शिवाजी महाराज द्वारा मुगल शासकों के विरोध में स्वातंत्र्य—संघर्ष की कथावस्तु है। संस्कृत भाषा में निबद्ध साहित्य में केवल गांधी ही नहीं, अपितु लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं का गाथा—गान गौरव के साथ हुआ है। पंढरीनाथ पाठक ने ‘महात्मचरितम्’ और वासुदेव शास्त्री ने लोकमान्य तिलक का जीवन ‘तिलकचरितम्’ लिखा। 1956 ईस्वी में लोकमान्य तिलक के जन्म—शताब्दी के अवसर पर तिलक का जीवन चरित्र बहुत—से संस्कृत विद्वानों द्वारा लिखा गया। डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी ‘विनायकवैजयन्ती’ संस्कृत में लिखी गई है। गुना (मध्यप्रदेश) के संस्कृत कवि सोमेश्वर व्यास ने ‘भारतीयरत्नसमुच्चय:’ में स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए संघर्ष का विशद व्याख्यान किया। रोहतक (हरियाणा) के सत्यदेव वासिष्ठ ने ‘सत्याग्रहनीतिकाव्य’ का प्रकाशन किया। संस्कृत भाषा के लिए सेवारत सत्यदेव वासिष्ठ स्वयं स्वतंत्रता सेनानी भी थे। ज्वालापुर से 1959 ईस्वी में प्रकाशित ‘महापुरुषकीर्तनम्’ संस्कृत ग्रंथ में धर्मदेव विद्यावाचस्पति द्वारा राम—कृष्ण—बुद्ध—विवेकानंद से आरंभ करके तिलक—लाला लाजपत राय—विपिन चंद्र—सुभाष बोस—सरदार पटेल—श्यामा प्रसाद मुखर्जी—अबुल कलाम आजाद—विनोबा भावे आदि स्वातंत्र्य—वीरों का पद्यबद्ध वर्णन किया गया है। जयपुर के देवकीनंदन शर्मा ने ‘राष्ट्रभक्तपंचकम्’ शीर्षक से प्रताप—शिवाजी—तिलक—गांधी—सुभाष के जीवन पर प्रशस्तियां प्रकाशित की हैं। स्वतंत्रता संग्राम में एक शिखरस्थ सेनानी थे माधवश्री हरिअणे। उन्होंने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की जीवनी संस्कृत पद्यों में ‘तिलकयशोऽर्णव:’ नाम से 3 खंडों में लिखी थी।

                15 अगस्त, 1947 को देश की स्वतंत्रता पर जो उल्लास छाया, उसका विस्तार संस्कृत विद्वानों ने भी भरपूर किया। उस समय प्रकाशित होने वाले सभी संस्कृत पत्रों में स्वातंत्र्य का साह्लाद हार्दिक अभिनंदन हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति पर संस्कृत पत्र—पत्रिकाओं के विशेषांक प्रकाशित हुए। डॉ. वेंकटराघवन् ने ‘स्वराज्यकेतु:’, डॉ. कुन्हन्राज ने ‘भारतप्रशस्ति:’ और पंडित रामकृष्ण भट्ट ने ‘स्वातंत्र्यज्योति:’ काव्यों का प्रणयन किया। जयपुर के ‘संस्कृतरत्नाकर:’ पत्र के अगस्त 1947 के अंक में संपादक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने घनाक्षरी छंद में अपने हर्षोद्गार प्रकट किए —

विश्वमंडलेऽस्मिन् गुरुगौरवं भजन्ती सेयमार्यावैजयन्ती जगन्मोलौ परितः प्रवातु।

सर्वतोऽपि पूर्वं मानवीयसभ्यताया गुरुर्देशो दत्तसभ्यतोपदेशो मङ्गलं दधातु।

नूनं नीतिनैपुणेन नीचैर्नमयन्ती शठान् दूरं दमयन्ती भटान् प्रेमभरात्संपृणातु।

पूर्वपरतंत्रतामपास्यामोघमंत्रतया सर्वतः स्वतंत्रतया भारतविभा विभातु॥

 ‘संस्कृतरत्नाकर:‘ के इसी अंक में देवकीनंदन प्रश्नवर‘ कवि द्वारा लिखित गीति अत्यंत मनोहर है। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने अपभ्रंश भाषा में व्यवहृत छप्पय छंद में भारत के विभाजन के वेदना—विषाद को भी लिखा —

भारतमिदमतिचिरात् पुराभूत्पूर्णस्वतन्त्रम्।

बहुतरवत्सरशते गतेऽपि च यत्परतन्त्रम्॥

तदिह दैवगतिवशाद्विभाजनदुर्नयदीनम्।

चतुरधिकद्विसहस्रवत्सरेऽभूत्स्वाधीनम्॥

संप्रति स्वतंत्रराष्ट्रान्तरे प्रजातंत्र-परिभासनात्॥

इह जयति जयपुराभ्यन्तरे नव्या श्रीर्नवशासनात्॥

 संस्कृत के जाने—माने मनीषी देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने 15 अगस्त, 1947 को शार्दूलविक्रीडित छंद में स्वातन्त्र्यवीरान्नुम:‘ विता लिखीजो जयपुर से प्रकाशित संस्कृतरत्नाकर:‘ पत्र में छपी —

ये कारागृहकोष्ठिकासु निगडैर्बद्धा: स्वदेशाहवे

वृत्तित्यागपरा असूनपि निजांस्त्यक्त्वाऽमरत्वं ययु:।

यैर्वैदेशिकपारतन्त्र्यनिगडादुन्मोचिता मातृभू—

स्तान् गांधिप्रमुखान् स्वराज्यतिलकान् स्वातन्त्र्यवीरान्नुम:।।

  औरगांबाद के डॉ. रुद्रदत्त पाठक ने नेताओं के चरित्र को उपनिबद्ध किया है। उन्होंने पंडित नेहरु व इन्दिरा गांधी पर महाकाव्य, नाटक, कविता, गद्य आदि बड़ी संख्या में प्रकाशित किए। ‘इन्दिराचरितम्’ का प्रकाशन श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से हुआ है। ‘नेहरूविजयव्यायोग:’ का लेखन जीव न्यायतीर्थ ने किया है, जो उत्तरप्रदेश से प्रकाशित है। जयपुर के पंडित नवलकिशोर कांकर ने वैदिकी भाषा में वैदिक छंदों में ‘राष्ट्रवेद’ का प्रणयन किया। इसमें राष्ट्र—नेताओं को संबोधित सूक्त विलिखित हैं, जिनमें इन्दिरा गांधी भी है। जयपुर के वैद्य चन्द्रशेखर शास्त्री द्वारा गद्य एवं पद्य में ‘इन्दिराप्रशस्ति:’ ग्रंथ लिखा गया है।

                प्रयाग के डॉ. जयशंकर त्रिपाठी ने ‘अस्मिता’ काव्य में चन्द्रशेखर आजाद के संघर्ष एवं प्राणोत्सर्ग (बलिदान) को आधुनिक गेय—छन्दों में महिमा मंडित किया है। राघोगढ़ (मध्यप्रदेश) से 1961 ईस्वी में प्रकाशित गद्यात्मक ग्रंथ में राष्ट्रीय भावना और स्वातंत्र्य चेतना का पग—पग पर विस्तार है। रघुनाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने ‘गांधीगरिमकाव्यम्’ एवं ‘जवाहरज्योति:’ काव्य—शृंखला लिखी और प्रकाशित की है।

                यहां आचार्य अमृतवाग्भव का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है, जिनका ‘राष्ट्रालोक’ काव्य ग्रन्थ प्रकाशित है। काशी में जन्में वैद्यनाथ शास्त्री ने स्वातंत्र्य—समर में सक्रिय भाग लिया। इनके द्वारा परशुरामस्तोत्र आदि काव्यों की रचना करते हुए ‘राष्ट्रालोक:’ काव्य में राष्ट्र का स्वरूप व देशवासियों के कर्त्तव्यों का व्यापक वर्णन किया हुआ है। प्रातःस्मरणीय गोवर्धनपीठाधीश्वर पंडितप्रकांड भारतीकृष्णतीर्थ स्वातंत्र्य संग्राम में सक्रियता से भाग लेते हुए कारागृह में रहे। मथुरा प्रसाद दीक्षित का ‘भारतविजयम्’ नाटक प्रसिद्ध है। वेदान्तरत्न पांडुरंग शास्त्री सुप्रथित विद्वान् हैं, उनकी लिखी ‘सत्याग्रह’ कथा ने दक्षिण भारत के सभी विद्वानों को प्रभावित किया। श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर ‘राजेन्द्रतरंगिणी’ और जवाहर लाल नेहरू पर ‘जवाहरतरंगिणी’ संस्कृत काव्य लिखे।

                पंडित जयराम शास्त्री ने ‘गांधीकल्पद्रुम’ लिखा। इन्होंने ‘जवाहरवसन्तसाम्राज्यम्’ नामक काव्य 1950 ईस्वी में लिखकर उसे पंडित जवाहरलाल नेहरू को भेंट किया। दिल्ली के प्रभुदत्त शास्त्री के संस्कृत काव्य तो प्रसिद्ध ही हैं। उनके लिखे ‘राष्ट्रकाव्यामृतम्’, ‘गांधी—नांदीश्राद्धामृतम्’ और ‘चर्खावन्दनामृतम्’ काव्यों के शीर्षक ही अपनी विषयवस्तु को बता रहे हैं। बिहार के रामनाथ पाठक ने 1952 ईस्वी में ‘राष्ट्रवाणी’ का लेखन किया। बीकानेर के पंडित फाल्गुन गोस्वामी ने ‘जयभारतादर्श:’ नाम से चंपूकाव्य (गद्य—पद्य मिश्रित) लिखा, जिसमें राष्ट्रभक्ति के प्रखर स्वर हैं। डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी जैसे कवियों ने ‘स्वातंत्र्यसंभवम्’ जैसे अनेक महाकाव्यों का प्रणयन किया है, जिसे विद्वान् जानते ही हैं।

                भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान् रहस्यवादी विद्वान् श्रीअरविन्द का चिंतन संस्कृत के विपुल साहित्य से अनुप्राणित है। इसमें संदेह नहीं कि भारत 13वीं शती से लगभग सात शतियों तक बाह्य विजेता लोगों से पदाक्रान्त होता रहा और उसका मानमर्दन होता रहा (कुछ भागों में अल्पकाल के लिए भारतीय राज्य अवश्य संस्थापित थे, यथा – विजयनगर साम्राज्य या मराठों के अन्तर्गत लगभग 150 वर्षों तक तथा पंजाब में लगभग 50 वर्षों तक महाराज रणजीत सिंह का राज्य)। अब पाठक स्वयं इसका पता लगाएं कि श्रीअरविन्द के अन्य कौन-से सपने पूरे हुए। क्या स्वतन्त्रता की प्राप्ति के इतने वर्षों के उपरान्त भारत आध्यात्मिकता के क्षेत्र में कोई विकास कर सका है? क्या सामान्य जनता के मन में राष्ट्रीयता की भावना घर कर सकी है? क्या विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक एकता का कोई चिह्न दृष्टिगोचर हो रहा है? क्या निकट भविष्य में इसकी कोई आशा है या संपूर्ण संसार विनाश के कगार पर खड़ा है? इन प्रश्नों के समाधान खोजने के लिए हमें हमारे पुरातन संस्कृत साहित्य की शरण में जाना ही पड़ेगा।

शास्त्री कोसलेन्द्रदास 
Assistant Professor, Department of Philosophy
Jagadguru Ramanandacharya Rajasthan Sanskrit University
Jaipur (Rajasthan) 302026 
Phone: +91- 92143-16999 (M) Twitter : @kosalendradas

जयपुर ।  

Comments (2)

  1. Babulal Sharma

    Great thoughts

  2. Baldev Choudhary

    संस्कृतं एव अष्माकं सर्वाषु भाषासु जननी विद्यते ।।

Leave your thought here

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select the fields to be shown. Others will be hidden. Drag and drop to rearrange the order.
  • Image
  • SKU
  • Rating
  • Price
  • Stock
  • Availability
  • Add to cart
  • Description
  • Content
  • Weight
  • Dimensions
  • Additional information
Click outside to hide the comparison bar
Compare
Alert: You are not allowed to copy content or view source !!