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टोंक का क्रान्तिकारी सपूत मीर आलम खाँ

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टोंक का क्रान्तिकारी सपूत मीर आलम खाँ


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आजादी का अमृत महोत्सव

टोंक का क्रान्तिकारी सपूत मीर आलम खाँ

रियासत टोंक में 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व करने वाला प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी था मीर आलम खाँ। आलम खाँ का जन्म 12 दिसम्बर 1817 को पुरानी टोंक में हुआ था। वर्तमान में यह क्षेत्र काली पलटन के नाम से जाना जाता है। मीर आलम खाँ ने सत्रह वर्ष की उम्र से ही देश की स्थिति के बारे में काफी जिज्ञासा प्रारम्भ कर दी थी। 1839 में आपने देवली(छावनी) में सैनिक के रूप में ब्रिटिश राज्यसेवा का शुभारम्भ किया।

उन दिनों टोंक का शासक नवाब वजीरूद्दौला था। वजीरूद्दौला अंग्रेजों का अत्यन्त स्वामिभक्त था। उसके शासनकाल में जनता पर करों का भार तो था ही, किसान भी सन्तुष्ट नहीं थे। समाज में अनेक असमानतायें थीं तथा शासकीय कार्य करने वाले व्यक्ति जनसामान्य पर मनमाने अत्याचार करते थे। यही कारण था, कि मुस्लिम वर्ग भी नवाब के कार्यों से असन्तुष्ट था। मीर आलम खाँ सैनिक होने के कारण हमेशा ऐसे शासन को उखाड़ने के लिए सेना के विद्रोह के विषय में ही सोचता रहता।

आखिरकार वह दिन आ ही गया। 3 जून 1857 को नीमच में हीरासिंह के नेतृत्व में जिस क्रान्तिकारी जत्थे ने विद्रोह किया था, वह अंग्रेज-सेना को पराजित करने एवं अंग्रेजों के नीमच से भाग जाने के बाद 5 जून को देवली पहुँचा था। अन्य क्रान्तिकारियों की सेना भी निम्बाहेडा से जहाजपुर होते हुए देवली पहुँची थी। इस समय अंग्रेज सेना के कैप्टन हार्डकेसल एवं लेफ्टिनेण्ट वाल्टर की जोधपुर से बुलायी गयी सैन्य टुकड़ियाँ मेवाड़ की सेना के साथ विद्रोहियों का पीछा कर रही थी। विद्रोही इससे आतंकित थे।

ऐसे समय में मीर आलम खाँ ने देवली में विद्रोह की शुरुआत सैनिक छावनी में आग लगा कर की तथा विद्रोही क्रान्तिकारियों के सहयोग हेतु स्वयं ने देवली की तीनों सैनिक बटालियनों का संयुक्त नेतृत्व संभाला। क्रान्तिकारियों के संघटित हो जाने से दमनकारी ब्रिटिश सेना क्रान्तिकारियों का कुछ नहीं बिगाड़ पायी, किन्तु जब नीमच छावनी के क्रान्तिकारी वीर दिल्ली की ओर कूच कर गये तब नवाब वजीरूद्दौला ने देवली में विद्रोह के दमन हेतु अंग्रेजों की वफादारी निभाने के उद्देश्य से टोंक से अपनी सेना देवली भेजी। अजमेर से भी अंग्रेज सैनिक टुकडी देवली में विद्रोह के दमन हेतु पहुँची। दोनों सैनिक टुकडियों के संयुक्त मोर्चे के विरुद्ध क्रान्तिकारियों को पराजय का मुख देखना पड़ा।

मीर आलम खाँ पराजय को सहन नहीं कर सका, अतः उसने ब्रिटिश सेवा को त्याग दिया तथा भीलवाड़ा चला गया। वहाँ हमीद खाँ पठान के साथ मिल कर क्रान्ति का अवसर ढूँढने लगा, किन्तु अवसर हाथ न लगने पर वह वापस टोंक लौट गया। जनवरी 1858 में टोंक में नवाब वजीरूद्दौला के ही कुछ स्वतंत्रता प्रेमी कुटुम्बियों ने बगावत करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया अतः विद्रोह प्रारम्भ हो गया। इसी समय ताँत्याटोपे भी सेना सहित टोंक आया था। ताँत्याटोपे के सेना सहित वहाँ आने पर टोंक के क्रान्तिकारी उनके साथ हो गये। मीर आलम खाँ भी अपने परिवार सहित क्रान्ति में सम्मिलित हुए।

बनास नदी के किनारे अमीरगढ़ के किले के निकट विद्रोही क्रान्तिकारियों की सेना का नवाब की सेना के साथ भयंकर संघर्ष हुआ। विद्रोहियों ने नवाब के दीवान फैजुल्ला खान को पकड़ कर नजरकैद कर दिया तथा तोपखाने पर अपना अधिकार कर लिया। मीर आलम खाँ के नेतृत्व में टोंक के क्रान्तिकारियों ने नगर को घेर कर टोंक राज्य पर अपने शासन की घोषणा कर दी। तब टोंक में 6 माह तक क्रान्तिकारियों ने ही शासन चलाया। अन्त में जयपुर के रेजीडेण्ट मेजर ईडन को अंग्रेजों ने दमन के लिए भेजा। ईडन विशाल सेना के साथ टोंक आया। ईडन की सेना ने क्रान्तिकारियों का भीषण दमन किया। अधिकांश क्रान्तिकारी भाग कर नाथद्वारा चले गये। ताँत्या टोपे भी नरवर के जंगलों में ईडन के सैनिकों द्वारा पकड लिया गया। मीर आलम खाँ का इस क्रान्ति के बाद कोई पता नहीं चला तथापि उनके त्याग एवं शौर्य की गाथा क्रान्ति के इतिहास में उल्लेखनीय बन गयी।  

डॉ. रामदेव साहू

द्वारा- राजस्थान संस्कृत अकादमी

जयपुर

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