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हमारी पृथ्वी

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हमारी पृथ्वी


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आजादी का अमृत महोत्सव

हमारी पृथ्वी

हमारी पृथ्वी जो पूर्व में जम्बूद्वीप के नाम से प्रसिद्ध थी इसका एक अवशिष्ट भाग मात्र है। यह सूर्य से 12 करोड़ कि. मी. नीचे स्थित है। पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ इस विषय में वेद – विज्ञान हमें बतलाता है कि पृथ्वी की संरचना भी पदार्थोत्पत्ति के सुनिर्धारित नियमों के अनुसार ही हुई है। आठ वसु इसके पितृप्राण हैं जो अदिति रूपा प्रकृति में पूर्वतो विद्यमान होते है, ऋषिप्राण के रूप में अत्रिप्राण सर्वाधिक मात्रा में विद्यमान है तथा देवप्राण के रूप में अन्नाद  अग्नि एवं सोम इसके केन्द्रीभूत तत्व है। वाक् का मूल तत्त्व द्रव्य इसकी आत्मा है। पृथ्वी का सृष्टा भी प्रजापति ही है जो ब्रह्म का पर्याय है तथा सूर्य की भाँति तपोलोक में अवस्थित है जिसे सविता भी कहा जाता है। पृथ्वी का मूल उत्पादक रजःकण (धूलिकण) सोम के शुष्क हो जाने पर अग्नि द्वारा उसकी ज्वलनक्रिया के अनन्तर होता है जो प्रारम्भ में ऊर्ज्ज के रूप में होता है। यह जब ऋक् (सौर अग्नि) से युक्त होता है तब मूर्त्तिमान हो जाता है। यजुष् (वायु )  से सम्पूर्ण होने पर गतिमान हो जाता है तथा साम ( सूर्य का प्रकाश) सम्बृक्त होकर पदार्थ निर्माण की प्रक्रिय के उपयोग योग्य हो जाता है। जब धूलिकण सोम एवं तेजन द्रव्य के संपर्क से संघात की स्थिति  में आते है तब अंगिरस अग्नि को अपने भीतर समेट लेते हैं जो विद्युत्मयी रश्मियों का पुंज होता है। इसके ऊपर धूलिकणों का आवरण सोम के कारण सघन अवस्था को प्राप्त करता है। और पृथ्वी बनता है। आप (जल ) इसका शुक्र ( बल ) है जो संघटक तत्व का कार्य करता है। द्वादश आदित्य यहाँ गैसीय रूप में प्रविष्ट होते हैंए जिनको यह संघटित बनाये रखता है। यह पृथ्वी षाट्कौशिक है अर्थात् इसके छः कोष है जो भृगु प्राण के प्रवेशानन्तर बनते हैं। इसके तीन कोष अग्नि वायु एवं आदित्य हैं जो मध्य से लेकर पृष्ठ तक तथा शेष तीन कोष पृष्ठ से पुनः वामावर्त्त क्रम में मध्य तक सोम वायु एवं आप हैं। यहाँ वायु को दो बार कहा गया है जो उसकी भिन्नता को बतलाता है। एक वायु अग्नि के साहचर्य वाला है तो दूसरा आप के साहचर्य वाला है। आप के साहचर्य वाला वायु ही गुरूत्व बल को उत्पन्न करता है जिससे यह पृथ्वी ग्रह न होते हुए भी ग्रहों की भाँति आकार वाली दिखायी देती है। सामान्य रूप से पृथ्वी के दो रूप हैं . दृश्य पृथ्वी एवं अदृश्य पृथ्वी। सूर्य बृहती वृत्त में अपने तेजोमय स्वरूप के उत्कर्ष को धारण करता है। हमारी पृथ्वी बृहती वृत्त की अन्तिम सीमा से नीचे स्थित है जिसका विस्तार  बाहर की ओर 96ॱ तक है। बृहती एवं पंक्ति वृत्त के नीचे स्थित पृथ्वी दृश्य पृथ्वी है जिस पर सूर्य का प्रकाश पहुँचता है किन्तु इसके बाद सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचने से पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अदृश्य पृथ्वी के रूप में भी विद्यमान है । किन्तु इतना ही पर्याप्त नहीं है हमारी पृथ्वी का क्षेत्र खगोल के बराबर ही है, अतः जलमग्नता के कारण कहीं कहीं पृथ्वी बाहर दिखायी देती है कहीं समुद्र के भीतर दिखायी देती है। सूर्य से वायव्य में 5 करोड़ 43 लाख 96 हजार किलोमीटर दूरी पर सुमेरू की स्थिति है जहॉ से पृथ्वी का आरम्भ होता है तथा इतनी दूर आग्नेय तक पृथ्वी का क्षेत्र है इस प्रकार 10 करोड़ 87 लाख 92 हजार किलोमीटर लम्बाई में ब्रह्माण्ड के अर्धवृत्त के समानान्तर पृथ्वी की स्थिति बतलायी गयी है। सजीवों का सौभाग्य कि वे पृथ्वी पर ही सम्भव हो सकते हैं। अन्यत्र नहीं।

डॉ. रामदेव साहू

द्वारा- राजस्थान संस्कृत अकादमी

जयपुर

Comment (1)

  1. Mr. Mohan chandra Dalai

    Pathami samskrutam nitya

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