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अशब्दमस्पर्शमरूपमव्य‍यम्

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अशब्‍दमस्‍पर्शमरूपमव्‍ययम्

तथारसं नित्‍यमगन्‍धवञ्च यत् ।

अनाद्यनन्‍तं महत: परं ध्रुवं

निचाय्य तन्‍मृत्‍युमुखात् प्रमुच्‍यते ।। कठोपनिषद् 1.3.15

जो शब्‍दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और बिना गन्‍ध वाला है तथा जो अविनाशी, नित्‍य, अनादि, अनन्‍त, महत् से भी श्रेष्‍ठ तथा सर्वथा सत्‍य तत्‍व है उसे जानकर मनुष्‍य मृत्‍यु के मुख से सदाके लिए छूट जाता है।

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अशब्‍दमस्‍पर्शमरूपमव्‍ययम्

तथारसं नित्‍यमगन्‍धवञ्च यत् ।

अनाद्यनन्‍तं महत: परं ध्रुवं

निचाय्य तन्‍मृत्‍युमुखात् प्रमुच्‍यते ।। कठोपनिषद् 1.3.15

जो शब्‍दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और बिना गन्‍ध वाला है तथा जो अविनाशी, नित्‍य, अनादि, अनन्‍त, महत् से भी श्रेष्‍ठ तथा सर्वथा सत्‍य तत्‍व है उसे जानकर मनुष्‍य मृत्‍यु के मुख से सदाके लिए छूट जाता है।

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