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रक्षाबंधन- बहन और भाई के स्नेह का अद्वितीय पर्व

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रक्षाबंधन- बहन और भाई के स्नेह का अद्वितीय पर्व


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आज़ादी के अमृत महोत्सव के अन्तर्गत रक्षाबंधन के अवसर पर

प्रतिवर्ष भारत और संपूर्ण विश्व में रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया जाता है,इस अवसर पर, बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है. और परमात्मा से उसकी खुशियों और सभी प्रकार की सफलता की कामना करती है। वहीँ भाई भी अपनी बहन को स्नेह स्वरूप प्रतिदान में कुछ सौगात और उपहार भेंट करता है, और यह प्रतिज्ञा करता है की कोई भी विपत्ति आये वो अपनी बहन की रक्षा हमेशा करेगा और भगवान से अपनी प्यारी बहन की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है. प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को यह अद्वितीय त्यौहार मनाया जाता है,हिंदू सिख जैन आदि अनेक संप्रदायों द्वारा रक्षाबंधन मनाया जाता है।

विभिन्न ग्रंथों के अनुसार यह पुण्य प्रदायक और पापों का नाश करने वाला पर्व है।
श्रावण मास किसानों, मछुआरों और समुद्र की यात्रा करने वाले लोगों के लिए काफी महत्व रखता है। रक्षाबंधन को नारियली पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन भारत के समुद्र तटीय इलाकों में वर्षा के देवता इंद्र और वरुण देवता की पूजा भी की जाती है। देवताओं को नारियल अर्पण किया जाता है और खुशहाली की कामना की जाती है, इस दिन नारियल समुद्र में भी फेंके जाते हैं, लोगों का मानना है कि प्रभु श्री राम ने माता सीता को वापस लाने के लिए इसी दिन अपनी यात्रा प्रारंभ की थी, और समुद्र को पत्थरों से निर्मित पुल के माध्यम से पार किया था।
नारियल के ऊपरी भाग में जो तीन छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, उन्हें प्रभु शिवजी का प्रतीक माना जाता है, किसानों के लिए यह दिन कजरी पूर्णिमा का होता है और किसान इसी दिन से खेतों में बीज बोना शुरू करते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं यह दिन ब्राह्मणों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वे इसी दिन अपने यज्ञोपवीत मंत्रोच्चारण के साथ बदलते हैं,और अपने जजमानों के रक्षासूत्र बांध कर उनकी खुशहाली की कामना करते हैं। वही इस पूर्णिमा को ऋषि तर्पण भी किया जाता है,इस विधि के खत्म हो जाने के बाद नारियल से बनी मिठाई भी खाई जाती है।

राखी को पहले ‘रक्षा सूत्र’ कहा जाता था। रक्षा सूत्र को बाद में आम बोलचाल की भाषा में राखी कहा जाने लगा, जो वेद के संस्कृत शब्द ‘रक्षिका’ का अपभ्रंश है। मध्यकाल में इसे राखी कहा जाने लगा।

रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा वैदिक काल से रही है जबकि व्यक्ति को यज्ञ, युद्ध, आखेट, नए संकल्प और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कलाई पर नाड़ा या सू‍त का धागा जिसे ‘कलावा’ या ‘मौली’ कहते हैं- बांधा जाता था। रक्षा बंधन के अलावा भी अन्य कई धार्मिक मौकों पर आज भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है।
यही रक्षा सूत्र आगे चलकर पति-पत्नी, मां-बेटे और फिर भाई-बहन के प्यार का प्रतीक बन गया। रक्षा बंधन के दिन बहनों का खास महत्व होता है। विवाहित बहनों को भाई अपने घर बुलाकर उससे राखी बंधवाता है और उसे उपहार देता है रक्षा बंधन पर बहनें अपने भाई को राखी बांधती हैं।
राखी का स्वरूप भी समय के साथ बदलता गया,
वर्तमान में तो राखी के कई रूप हो गए हैं,राखी कच्चे सूत से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की हो सकती है।
इंद्र की पत्नी के कारण मनाया जाता है त्योहार : भविष्य पुराण में वर्णित है कि देव और असुरों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब असुर या दैत्य देवों पर भारी पड़ने लगे। ऐसे में देवताओं को हारता देख देवेंद्र इन्द्र घबराकर ऋषि बृहस्पति के पास गए। तब बृहस्पति के सुझाव पर इन्द्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने रेशम का एक धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। जिसके फलस्वरूप इंद्र विजयी हुए। कहते हैं कि तब से ही पत्नियां अपने पति की कलाई पर युद्ध में उनकी
युद्ध में उनकी जीत के लिए रक्षासूत्र बांधने लगी।

राजा बली और माता लक्ष्मी के कारण भी मनाया जाता है यह त्योहार-
स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत पुराणों के अनुसार जब भगवान वामन ने महाराज बली से तीन पग भूमि मांगकर उन्हें पाताललोक का राजा बना दिया तब राजा बली ने भी वरदान के रूप में भगवान से रात-दिन अपने समक्ष रहने का वचन ले लिया। भगवान को वामनावतार के बाद पुन: माँ लक्ष्मी के पास जाना था, लेकिन भगवान यह वचन देकर फंस गए, और वे वहीं रसातल में राजा बली की सेवा में रहने लगे। उधर पति को न पाकर माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को सब बताया और एक उपाय बताया, तब लक्ष्मीजी ने राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाया और प्रतिदान में अपने पति भगवान विष्णु को मांग लिया और अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं। इसीलिए रक्षा बंधन पर महाराजा बली की कथा सुनने का भी प्रचलन है।

महारानी द्रौपदी की रक्षा से भी जुड़ा है यह पर्व : एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। यह प्रसंग भी रक्षा बंधन के महत्व को प्रतिपादित करता है।

युधिष्ठिर और कृष्ण : ऐसा भी कहा जाता है कि जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं, तब कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी।

कृष्ण और सुभद्रा की कहानी

सुभद्रा का जन्म कृष्ण और बलराम की स्नेही बहन के रूप में हुआ था। जब सुभद्रा ने अर्जुन से विवाह करना चाहा, तो कृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम की इच्छा के विरुद्ध जाकर उसे महान योद्धा अर्जुन से विवाह कराया। सुभद्रा ने बाद में योद्धा पुत्र अभिमन्यु को जन्म दिया।भाई और बहन के बीच का बंधन इतना मजबूत है कि पुरी में सुभद्रा की पूजा उनके भाइयों कृष्ण और बलराम के साथ की जाती है।

भगवान विष्णु और माँ पार्वती की रक्षाबंधन की कहानी-

माता पार्वती भगवान शिव से विवाह की आशा के साथ बड़ी हुईं लेकिन शिव ने अपने प्रेम, सती के खोने के कारण उनसे विवाह करने से इनकार कर दिया। पार्वती खुद को शिव से शादी करने के योग्य बनाने के लिए कड़ी मेहनत करती हैं और भगवान विष्णु उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने उसे अपनी कलाई पर राखी बांधने के लिए कहा, ताकि उसके भाई के रूप में वह उसके रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को दूर कर सके। किंवदंती है, कि शिव और पार्वती के दिव्य विवाह के लिए, भगवान विष्णु ने वे सभी समारोह किए जो दुल्हन के भाई द्वारा किए जाते हैं।
बहन द्वारा भाई को राखी बांधने का मंत्र-
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।
जयतु सनातन।🚩

 
 
 
पंकज ओझा 
RAS

शासन संयुक्त सचिव
कला संस्कृति और पुरातत्व विभाग, राजस्थान।

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