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संस्कृत साहित्य में स्वतन्त्रता दिवस

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संस्कृत साहित्य में स्वतन्त्रता दिवस


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आजादी का अमृत महोत्सव

स्‍वतन्त्रते भगवति त्‍वामहं यशोयुतां वन्‍दे ।

जयोऽस्‍तु ते श्रीमहन्‍मंगले शिवास्‍पदे शुभे ।। 

हे यशस्विनि ! भगवति ! स्‍वतन्‍त्रता-देवि ! मैं तुम्‍हारी वन्‍दना करता हूँ, हे मंगलकारिणि ! शुभदायिनी तुम्‍हारी जय हो । 

स्वतन्त्रता आन्दोलन के महानायक विनायक दामोदर वीर सावरकर ने अपने काला पानी नामक उपन्यास में एक गीत की प्रथम पंक्तियॉं संस्कृत भाषा में लिखते हुए भारत की स्वतन्त्रता देवी की वन्दना तथा उसकी मंगल कामना की है। स्‍वतन्‍त्रता के इस मूर्त स्वरूप को देखा और सभी भारतीयों के दिलों में श्रद्धा के भाव जगाये सावरकर ने जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन में और अण्डमान निकोबार की जेल में बिताया।

आज विश्व के लोकतान्त्रिक देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले भारत देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन अहं भूमिका रखता है। यह वो दिन है जब भारत राष्ट्र ने शताब्दियों की परतन्त्रता के बाद स्वतन्त्रता का सूर्योदय देखा, इसके लिए शान्ति और क्रान्ति के विचारों से ओतप्रोत लाखों वीरों ने हँसते हँसते आत्माहुति दी और सौंप गये स्वतन्त्र भारत की बागडोर, स्वतन्त्रता समर में तन, मन और धन से सहयोग करने वाले अपने साथियों को, आन्दोलन में अग्रगण्य रहे अपने नेताओं को तथा स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए बलिदान देने वालों को ।  श्रद्धा से स्मरण कर उनको श्रद्धाजलि दी राष्ट्र के अनेक साहित्यकारों ने जिनमें जयपुर के प्रसिद्ध मनीषी देवर्षि कलानाथ शास्त्री भी एक हैं, जिन्होंने अपने भावों को स्वातन्त्र्यवीरान् नुमः के श्लोक में बद्ध किया है

ये कारागृहकोष्ठिकासु निगडैर्बद्धाः स्वदेशाहवे,

वृत्तित्यागपरा असूनपि निजांस्त्यक्त्वाऽमरत्वं ययुः ।

यैर्वैदेशिकपारतन्त्र्यनिगडान्ता मातृभूः.

 तान् गान्धिप्रमुखान् स्वराज्यतिलकान् स्वातन्त्र्यवीरान् नुमः ॥

स्वतन्त्रता के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाले इन बलिदानियों से तथा भारत को आजाद करवाने वाले इन वीरों से प्राप्त देश की स्वतन्त्रता के इस दिवस का हर्षोल्लास भारत की समस्त जनता के हृदयों में बहुत दिनों तक छाया रहा और इसकी तात्त्विक अनुभूति करने वाले लगभग सभी भाषा के साहित्यकारों तथा कवियों ने अपने विचारों को लेखों और कविताओं के माध्यम से प्रकट किया जिसे तत्समय प्रचलित अखबारों एवं पत्र पत्रिकाओं ने प्रमुखता से छापा। संस्कृत भाषा से जुड़े साहित्यकारों ने भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। डा. वेंकटराघवन् ने स्वराज्यकेतुः‘ डा. कुन्हनराजा ने भारतप्रशस्ति और बैंगलोर के रामकृष्ण भट्ट ने स्वातंत्र्यज्योतितथा इसी तरह अनेक कवियों ने विविध काव्य लिखे स्वतन्त्रता के लिए। स्वतन्त्रता प्राप्ति की इस अद्भुत घटना के लिए जयपुर से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र संस्कृतरत्नाकरका भी विशेषांक प्रकाशित किया गया। अगस्त 1947 के अंक में इसके सम्पादक और संस्कृत भाषा में भाषायी छन्दों को स्थान देने के लिए प्रथम प्रयोगधर्मी जयपुर के भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने घनाक्षरी छन्द में इस स्वतन्त्रता की शोभा का वर्णन करते हुए लिखा-

विश्वमण्डलेऽस्मिन् गुरुगौरवं भजन्ती

सेयमार्यवैजयन्ती जगन्मौलिं परितः प्रवातु ।

सर्वतोऽपि पूर्वं मानवीयसभ्यतायाः

गुरुदेशो दत्तसभ्यतोपदेशो मंगलं दधातु ॥

नून नीतिनैपुणेन नीचैर्नमयन्ती शठान्

दूरं दमयन्ती भटान् प्रेमभरात् संपृणातु ।

पूर्वपरतन्त्रतामपास्यामोघमन्त्रतया सर्वत:

स्वतन्त्रतया भारतीयविभा विभातु ।।

स्वतन्त्रत भारत की प्रशस्ति में देवकीनन्दन प्रश्नवर ने स्वतन्त्र भारत जय जय जय के रूप में गीत लिखा। आजादी के इस स्वर्णिम दिवस की स्मृति को भारतीय विक्रम सम्वत् में उल्लिखित किया भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने जिन्हें भारत विभाजन का क्षोभ रहा। इस क्षोभ की अभिव्यक्ति को भी इन्होंने इसी कविता में प्रकट किया है । हिन्‍दी के छप्पय छन्द में लिखित यह वर्णन बडी ही मार्मिक स्थिति प्रस्तुत करता है-

भारतमिदमतिचिरात् पुराभू्त् पूर्वस्वतन्त्रम्,

बहुतरवत्सरशते गतेऽपि च यत् परतन्त्रम् ।

तदिह दैवगतिवशाद् विभाजनदुर्नयदीनम्,

चतुरधिकद्विसहस्रवत्सरेऽभूत् स्वाधीनम् ॥

सम्‍प्रति स्‍वतन्‍त्रराष्‍ट्रान्‍तरे प्रजातन्‍त्रपरिभासनात्।

इह जयति जयपुराभ्यन्‍तरे नव्‍या श्रीर्नवशासनात् ॥

इस छप्‍पय छन्‍द में  रचना नियमों के बन्‍धन के फलस्‍वरूप मास एवं तिथि का लेख नहीं हो पाया है। फिर भी लोकतन्‍त्र की छवि को उकेरा गया है। प्राचीन काल से ही पूर्ण स्वतंत्र भारतवर्ष शताब्दियों तक परतन्त्र रहा फिर 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति के अवसर पर भी दुर्भाग्यवश अंग्रेजों की विभाजन की दुर्नीति का शिकार हो गया।

भारत की स्वतन्त्रता के दिवस की तिथि को पूर्णतया संस्कृत के लघु गुरु यति आदि के नियमों से बंधे छन्दों में ढाला है वाराणसी के मूर्धन्य संस्कृत भाषा के सनातन कवि रेवाप्रसाद द्विवेदी ने अपने ‘स्वातन्‍त्र्यसम्‍भवम्’  महाकाव्य के चौदहवें सर्ग में। जिस दिवस भारत की स्वतन्त्रता का सूर्योदय हुआ उसका साक्ष्य प्रस्तुत करता है उनका यह पद्य –

विविध-विविधैर्यत्‍नैर्देशान्‍तरस्थितिमीयुषा-

मपि विचलितं जातं चक्रं पदेऽत्र महीयसाम् ।

अथ जलनिधिश्रुत्‍यङेकन्‍दोरगस्‍तशरेन्‍दुके,

दिवस उदगात् स्‍वातन्‍त्र्येणैव साकमहर्पति: ।।

इस स्वतन्त्रता प्राप्ति के अवसर पर सम्पूर्ण दिशाएं शीतल मन्द सुगन्ध पवन का अनुभव कर प्रसन्न हो रही थी महात्मा गान्धी और जवाहर लाल नेहरू ने इस स्वतन्त्रता देवी को पुष्पाञ्जलि अर्पित की। ‘स्वातन्‍त्र्यसम्‍भवम्’ महाकाव्य में ही इस प्रसंग का वर्णन किया गया है-

जयति स महान् नेता गान्धी स वीरजवाहरो,

जयति जयति श्रीमान् स्वातन्त्र्यसूर्यमहोदयः ।

इति परिगता वाग्भिः काष्ठाः प्रसादमवाप्‍नुवन्,

निगमनिगदैर्यद्वत् पुष्पाञ्जले: प्रविसर्जने।।

स्वतन्त्रता के दिवस पर महात्मा गांधी की जय हो, वीर जवाहर की जय हो इत्यादि नारों से आकाश गुंजायमान था। भारत की स्वतन्त्रता का यह दिवस आज भी साहित्यकारों को निरन्तर प्रेरित कर रहा है। इस आलेख को लिखने वाले प्रो. ताराशंकर शर्मा ‘पाण्‍डेय’ ने अपने त्रिरंगविशतिः काव्य में शान्ति एवं क्रान्ति से प्राप्त स्वतन्त्रता के इस दिवस का स्पष्टतया इस प्रकार वर्णन किया है-

शान्त्या क्रान्त्यातिनत्या कृतबहुबलिभिः पूरुषः शौर्यवद्भिः,

गोत्राम्भोधिग्रहार्के रुचिरशुभमये हायनेऽगस्तमासे ।

प्राणान् हुत्वापि याऽऽत्ता शरशशिनि दिने लोकतन्त्रात्मरूपा

दिव्या स्वाधीनता सा सकलसुखमयी देशभक्तैर्हि रक्ष्या- ।।

इस पद्य में भारतीय स्वतन्त्रता का तथ्यात्मक तिथि वर्णन करते हुए गोत्रम्भोधिग्रहार्के हायने से 1947 वर्ष का अगस्तमासे से अगस्त महीने का तथा शरशशिनि दिने से पन्द्रहवें दिन का सम्यक्तया उल्लेख किया गया है।

देश की आजादी का महोत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है। स्वतन्त्रता दिवस की यह वेला भारतीयों के दिलों में निरन्तर बसी रहे और इसकी स्मृतियाँ तरोताजा रहे इसी भावना को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतन्त्रता दिवस की पुण्यवेला में दिल्ली के लाल किले पर भारतीय ध्वज तिरंगा फहराया जाता है। यह तिरंगा ध्वज सूर्य की किरणों के साथ प्रकाशित होता हुआ भारत की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा ‘पाण्‍डेय’ ने ‘दूर्वा’ पत्रिका में प्रकाशित अपने  त्रिरंगविशति: काव्य में ही इसी भाव को प्रदर्शित किया  है-

राष्ट्रस्वातन्त्र्यलब्धौ सकलजनमनो-मोदकस्तोलनेन

दिल्लीस्थे रक्तदुर्गे गगनतलगतो नो ध्वजोऽयं त्रिरंगः ।

प्राच्यां दोधूयमानो दिनकरकिरणैः काशते भारतात्मा,

विश्वस्मिन् तेन कार्यं जगति निजशिरः प्रोन्‍नतं भारतीयै: ॥

स्वतन्त्र भारत के लिए शुभकामनाऐं प्रकट करते हुए संस्कृत के कविवरेण्य पद्मश्रीसम्मान प्राप्त डॉ. रमाकान्त शुक्ल ने अपने भाति मे भारतम् काव्य में लाल किले और संसद् पर फहराते तिरंगे की शान को प्रकट किया है-

यस्य दिल्लीस्थिते रक्तदुर्गे शुभे,

संसदश्चोत्तमांगे त्रिरंगध्वजः ।

सार्वभौमी स्वसत्ता वदत्युल्लसन्,

भूतले भाति तन्मामकं भारतम् ।।

भारत के प्रथम स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर भारत में प्रत्येक मनुष्य प्रसन्न हो रहा था, घर-घर में दीप जलाये गये. झण्डे फहराये गये। सनातन कविवर डॉ. रेवाप्रसाद जी ने अपने ‘स्वातत्र्यसम्भवम्’ काव्य में इसे अत्यधिक भावपूर्ण शब्दों में वर्णन किया है-

क्‍व नु खलु तदा नासीत् कल्लोलिनी परिवाहिता,

प्रमदमनसा सोल्लासानां प्रहर्षमयी सताम् ।

प्रतिगृहमदेदीप्यन् दीपा ध्वजाश्च समुन्नता,

नभसि हृदयप्रख्या लोकस्य तीव्रमनीनटन् ।

स्वतन्त्रता के प्रति हमारी ये भावनाएँ और समर्पण हमेशा बना रहे और हम भारतमाता की प्रशस्ति का गुणगान कर उसकी समृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहें, यह सन्देश दिया है ‘झांसीश्वरी’ काव्य में इसके रचयिता सुबोध चन्द्र पन्त ने-

देशे देशे भवतु वितता देशभक्तिर्वरण्या

कण्ठे कण्ठे ध्वनतु मधुर कीर्तन देशमातुः ।

चित्ते चित्ते विलसतु नृणां मातुरौन्‍नत्यचिन्‍ता,

योऽस्माकं भवतु सफल: क्षिप्रमास्थीयमानः ।।

स्वर्णभूमि भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही भारतीय जनता को भी प्रणाम करते हुए दक्षिण भारत के प्रसिद्ध कवि श्रीराम वेलणकर अपने छत्रपतिशिवराज्यम् काव्य में लिखते हैं-

नमो मंगले! मातृदेवते स्वर्णभूमे! ते।

स्वतन्त्रतायै नमो नमस्ते भारतीयजनते।।

इस प्रकार अनेक संस्‍कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में यथास्‍थान स्‍वतन्‍त्रता दिवस का गौरवगान किया है।

प्रो. ताराशंकर शर्मा ‘पाण्डेय’

कुलपति,

श्री कल्‍लाजी वैदिक विश्‍वविद्यालय,

निम्‍बाहेडा, चित्‍तौडगढ (राज.)

प्रोफेसरचर साहित्‍य विभाग

ज.रा. राजस्‍थान संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय, जयपुर

मकान नं. 2381,खजाने वालों का रास्‍ता,

जयपुर ।  

Comment (1)

  1. C. P. Sharma

    शोभनातिशोभनम्
    मोमुद्यन्ते चेतांसि
    कोटिशः साधुवादाः भवद्भ्यः 🙏 🙏

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