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सन्तकवि तुलसीदास

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सन्तकवि तुलसीदास

जिस मध्यकाल को पूरी दुनिया में गहन अन्धकार में निमग्न काल के रूप में देखा जाता है, उसी मध्यकाल में भारत ने साहित्य और चिन्तन के क्षेत्र में उदात्त उत्कर्ष स्थापित किये। भक्ति तथा प्रगतिशीलता ये दो अवधारणायें परस्पर विरोधी नहीं हैं अपितु परस्पर पूरक हैं। इन दोनों अवधारणाओं के समन्वय ने भारत की रचनात्मकता और चिन्तन की वृत्ति को एक साथ स्पर्श किया। ऐसी विलक्षणता विश्व की किसी भाषा और संस्कृति में एकत्र दृष्टिगोचर होना सम्भवतः दुर्लभ है।

          इस मध्यकाल में अनेक कवि हुए जिसमें सन्तकवि तुलसीदास अपनी ग्रन्थराशि से भारतीय जन-मानस पर अमिट छाप छोड़ते हैं। इनका साहित्य लोकाश्रय में रचा गया साहित्य है। साहित्य और लोक का यह सम्बन्ध अभूतपूर्व है।

          गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस मानवीय मूल्यों के मण्डप में अन्त्योदय का अनुष्ठान है। रामचरितमानस वस्तुतः ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का मन्त्रोच्चार है। यद्यपि मानस के प्रारम्भ में तुलसी इसे स्वान्तःसुखाय कह रहे हैं परन्तु सच तो यह है कि उनकी लेखनी सर्वजनहिताय की धुरी पर ही घूमती है। जिसकी लेखनी मानवीय मूल्यों का मन्त्रोच्चार करती हो, परोपकार के प्रयोग करती हो, शत्रुता का कर्दम सुखा देती हो, द्वेष का दावानल बुझाती हो, कटुता को निर्मूल करती हो, सद्भाव के सुमनों को विकसित करती हो, चैतन्य का दर्शन कराती हो, भ्रातृत्व के भाष्य लिखती हो, ऐसी लेखनी का हर शब्द अथवा मन्त्र लोकम›लाधायक बन जाता है।

          कवि कुल के महानायक संत शिरोमणि महाकवि तुलसीदास जी युगबोध के द्रष्टा थे। उनका आविर्भाव उस कालखण्ड में हुआ था जब जीवन मूल्यों का ह्रास हो रहा था। समाज में विघटन की प्रवृत्तियाँ अपने पैर पसार रही थीं। मुगलों के शासन में अनेक कुचक्र रचे जा रहे थे और भारतीय संस्कृति के प्रतीक-चिह्नों को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा था। ऐसे समय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने समाज को राम नाम की संजीवनी बूटी प्रदान की जिसे हृदय में धरकर भारतीय धार्मिक भावना पुनः जीवन्त हो उठी।

          श्रीरामचरित के माध्यम से उन्होंने राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न आदि चरित्रों को मानो मानवीय मूल्यों के साकार रूप में स्थापित किया। प्रत्येक विकट परिस्थिति में जीवन जीने की कुशलता का निरूपण कर तुलसीदास जी ने सामान्य मानव को अभिप्रेरणा प्रदान की है। उन्होंने ब्रह्म तत्त्व को राम के व्याज से समझाया है। निराकार ब्रह्म जब साकार होता है तब वह राम के रूप में आविर्भूत होता है, इसीलिए श्रीराम महान् आदर्श हैं और अनुकरणीय हैं।

          तुलसी का काव्य अनेक सूत्र प्रदान करता है। वे राजधर्म पर अपने मनोगत को जब प्रकट करते हैं तो पदे-पदे राम-राज्य के उपाय ही निर्दिष्ट करते हैं –

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान-पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।

-अयोध्याकाण्ड-315

मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो खाने-पीने को तो एक ही है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगो का पालन-पोषण करता है। जो भी भोज्य-पदार्थ मुख के माध्यम से भोगा जाता है, मुख स्वयं तक उसको सीमित नहीं रखता अपितु मुख का यह कर्तव्य है कि प्रत्येक अंग तक उसको यथोचित अनुपात में वितरित करे।

चैदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।

-सुन्दरकाण्ड-832

एकच्छत्र स्वामित्व होने पर भी लोकमंगल ही करणीय हैं क्योंकि भूतद्रोह होने पर चतुर्दश भुवनों का स्वामी भी प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं हो सकता है।

          तुलसी तप के विषय में बहुत सूक्ष्मता से विचार करते हैं। वे कहते हैं तपस्या के लिए वन-गमन कोई आवश्यक घटक-स्थान नहीं है अपितु तपस्या तो राजमहल में भी सम्भव है। समस्त भोगों के मध्य तपःपूर्ण आचरण की अपेक्षा तुलसी जैसे महाकवि ही कर सकते हैं –

लखन राम मिथ कानन बसहीं।

भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।

-अयोध्याकाण्ड, पृ. 682

लक्ष्मण, राम और सीताजी तो यद्यपि कानन में बसते हैं परन्तु भरतजी तो राजभवन में रहकर ही तप के द्वारा शरीर को कर्षित कर रहे हैं।

          तुलसी गुरु की महिमा को साक्षात् तथा परम्परया दोनों रीतियों से निरूपित करते हैं। वर्षा ऋतु के कारण पृथिवी पर जो जीव भर गये थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरु के प्राप्त हो जाने पर संदेह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं।

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।

सद्गुरु मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।

-किष्किन्धाकाण्ड-17

यह शरद ऋतु की अपेक्षा गुरु का लक्षण अधिक प्रतीत होता है। इसकी ध्वनि भी व्यापक है कि जो संदेह और भ्रम के समूह को नष्ट करने में सक्षम होता है वही वस्तुतः सद्गुरु है न कि तदितर।

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभगति सुख नाना।

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चांद कि नाईं।।

जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति आदि चाहता है। उसे परस्त्री के ललाट का उसी प्रकार त्याग कर देना चाहिए जैसे चैथ के चन्द्रमा का दर्शन नहीं किया जाता। यह तुलसीदास का स्त्रीविमर्श कहा जा सकता है।

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

-सुन्दरकाण्ड 840

मनुष्य के मन की निर्मलता को सर्वोच्च आसन पर अभिषिक्त करते हुए तुलसी कहते हैं कि मुझे कपट, छल और छिद्र नहीं सुहाते। कपट, छल-छद्म से आप उदात्तता के सिद्धासन को कदापि प्राप्त नहीं कर सकते।

उमा संत कह इहइ बड़ाई। मंद करत जो करई भलाई।

तुम पितु सरिस भलेहिं मोहि माया। राम भजें हितनाथ तुम्हारा।

-सुन्दरकाण्ड 837

सन्त की यही महिमा है कि वे मन्द आचरण करने वाले के प्रति भी भलाई ही करते हैं। यह विभीषण के प्रसंग में सार्वभौमिक सूक्ति प्रयुक्त की गई है।

          तुलसी समाज और व्यक्ति के जीवन को मर्यादाभाव से पोषित देखना चाहते थे। तुलसी का सारा ग्रन्थ इसी रामभक्तिपूर्ण दृष्टिकोण से प्रभावित है। वे कहते हैं –

‘‘रामकथा जग मंगल करनी।’’

‘‘रामभगति-भूषित जिय जानी।’’

‘‘सुनिहाहि सुजन सराहि सुबानी।’’

‘‘रामचरित सर बिनु अन्हवाएँ।

सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।’’

डॉ. सरोज कौशल

प्रोफेसर, संस्कृत-विभाग एवं

निदेशक, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ,

जयनारायण व्यास वि.वि., जोधपुर

ईमेल- saroj.kaushal64@gmail.com

Comments (10)

  1. Manju

    सुसुंदरम्😊

  2. Deepawali vyas

    अतिसुंदर

  3. डॉ राजू

    महान संत तुलसीदास जी के बारे में प्रोफेसर सरोज कौशल मैडम ने बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी ब्लॉग लिखा

    1. Jahnavi Dadhich

      यह लेख अद्वितीय विद्वत्ता पूर्ण और गंभीर भावपूर्ण है|

  4. डॉ छैलसिंह राठौड़

    प्रो सरोज कौशल जी निदेशक पण्डित मधुसूदन ओझा शोधप्रकोष्ठ संस्कृत विभाग जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर का तुलसीदास जयन्ती के अवसर पर यह शोध आलेख पढकर आनन्द की अनुभूति हुई ।
    गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामचरित-चर्चा के साथ ही साथ 25 स्तुतियां और 22 गीताएं है जिसमें 13 तो स्वयं भगवान रामचन्द्र जी द्वारा कही गई है ।
    तुलसीदास जी ने जीवों की तीन कोटियों में विभक्त किया है – विषयी , साधक और सिद्ध । साधक लोगों को ही गोस्वामी जी ने रामचरितमानस का अधिकारी माना है । कलयुग में अधिक संख्या विषयी लोगों की है इसलिए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में उनके कल्याण मार्ग को बतलाया हैं । सिद्ध लोग तो भक्ति मार्ग पर चलते ही है ।
    वाल्मिकी रामायण को समझे बिना रामचरितमानस को समझना कठीन है । संस्कृत निष्ठ विद्वान या विदुषी ही तुलसीदास जी के दर्शन का गुढार्थ समझा सकता है । ऐसी ही विदुषी प्रो सरोज कौशल जी है आप वैदिक दर्शन , भारतीय दर्शन , और आधुनिक संस्कृत साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर है ।
    डॉ संजय झाला जी निदेशक संस्कृत साहित्य अकादमी जयपुर का हार्दिक अभिनन्दन । आप वर्तमान समय में संस्कृत भाषा के लिए सतत् प्रयासरत है ।

    डॉ छैलसिंह राठौड़,
    पुर्व अतिथि शिक्षक संस्कृत विभाग जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर ।
    ईमेल chhealsinghrathore@gmail.com

  5. Jahnavi Dadhich

    अति भावपूर्ण शब्दों द्वारा बातों को समझाया है…

  6. Jahnavi Dadhich

    यह लेख अद्वितीय विद्वत्ता पूर्ण और गंभीर भाव युक्त है|

  7. Dr. Satya Mudita Snehi

    नमस्कार मैम, आपके द्वारा लिखे गए इस ब्लॉग को पढ़कर ऐसा लगा जैसे आप प्रत्यक्ष रुप से उपस्थित होकर राम के चरित को समझा रही हैं। आपकी लेखनी से बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं सारगर्भित जानकारी प्राप्त हुई। बहुत-बहुत धन्यवाद।

  8. Prithvi Raj Singh

    संत शिरोमणि तुलसीदास जी के जीवन-दर्शन, जीवन-चरित प्रभृति के अभिषंग में आप द्वारा प्रस्तुत/अभिदत्त मूर्धन्य एवं तात्त्विक विचार प्रत्येक भक्ति, साहित्यिक एवं भाषायी जिज्ञासुओं के अर्ध्व का पाथेय है। असंशय प्रस्तुत आदित्यवत् ज्ञानग्रह उपाबद्ध पाठक-श्रोता-चिंतक-विचारक के अंतःकरण में महाकवि तुलसीदास जी के ग्रंथों-लेखनी-साहित्य के प्रति उत्तरोत्तर अनंतरूपेण जैज्ञासिक प्रकाश का आविर्भाव करेगा।

  9. Arun ranjan Mishra

    Prof.Saroj Kaushal is a highly productive thinker in the cultural world of India today.I am deeply influenced by her present discussion.a.r.mishra,Santiniketan.

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