Blog

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों का सूत्र है – शिक्षक दिवस

ब्लॉग

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों का सूत्र है – शिक्षक दिवस

Shikshak Diwas

आज समग्र राष्ट्र शिक्षक दिवस के बहाने अपने पूर्व  राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन् को स्मरण कर रहा है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन् महान्  दार्शनिक तथा सफल शिक्षक थे  । उनका जन्म ५ सितम्बर , १८८८ को  चेन्नई के पास एक गाँव में हुआ  था । उन्होंने विश्व के अनेक देशों में भारतीय दर्शन का प्रचार किया । वे अनेक विश्वविद्यालयों  के कुलपति और कुलाधिपति रहे  । अपनी इसी महनीयता के कारण वे भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आरूढ़ हुये । शिक्षक से लेकर राष्ट्रपति तक  की अपनी  यात्रा में वे शिक्षक ही बने रहे । उन्होंने प्रभूत लेखन किया , जो आज भी दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है । राधाकृष्णन् की कृतियाँ भारतीय दर्शन को जानने और समझने की सशक्त सोपान हैं ।

 राधाकृष्णन् को भारतरत्न से भी सम्मानित किया गया । शिक्षक के रूप में उनके योगदान को चिरस्मरणीय बनाने के लिये भारत सरकार ने उनके जन्मदिवस को “शिक्षकदिवस” के रूप में  मनाने का निर्णय लिया जो प्रतिवर्ष आज के दिन मनाया जाता है । भारतीय संस्कृति में शिक्षक का स्थान सबसे ऊँचा है। वह जन्म देने वाले माता – पिता से भी बढ़ कर है । हमारे देश में शिक्षा केवल आक्षर -ज्ञान  या किसी ग्रन्थ  के अध्ययनमात्र तक सीमित नहीं है ।  सतत कुछ सीखते रहने, उसे आत्मसात् करते रहने ,अधीत विषय को अपने में उतारते रहने  तथा  तदनुसार आचरण करते रहने की प्रक्रिया को ही भारत में “शिक्षा” शब्द से अभिहित किया जाता है। भारतीय संस्कृति में जीवन चार आश्र्मों में बाँटा गया है – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । इनमें से प्रथम “ब्रह्मचर्य आश्रम “ शिक्षा से सम्बद्ध है ।भारत वर्ष में शिक्षा जीवन का महनीय संस्कार है ।हम पाते हैं  कि वैदिककाल से ही  भारतवर्ष में शिक्षा को लेकर जागरूकता थी । प्राचीन काल में शिक्षा गुरुकुल में होती थी । ब्रह्मचारी शिक्षा के लिये गुरुकुल में ही निवास करता था।  बालक के इसी  आश्रम को “ब्रह्मचर्याश्रम” कहते थे जो लगभग बारह वर्ष की उम्र से चौबीस वर्ष की उम्र तक होता था । शिक्षा आरम्भ  करने के पहले ब्रह्मचारी का उपनयन संस्कार किया जाता था । आश्रम में बटु की शिक्षा, भरण – पोषण आदि का दायित्व गुरुकुल पर होता था ।

 संस्कार शब्द  सम् उपसर्ग पूर्वक  कृ धातु से  घञ् प्रत्यय करने से निष्पन्न होता है। इसका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है – संस्क्रियते अनेन – जिससे कोई वस्तु संस्कृत , परिष्कृत , विमल  या शुद्ध की जाती है , उसे संस्कार कहते हैं। भारतीय संस्कृति में संस्कारों का  अत्यधिक महत्त्व है। मनुष्य की नैतिक, मानसिक,  और आध्यात्मिक उन्नति के लिये तथा उसमें बल , वीर्य , प्रज्ञा और दैवीय गुणों के आविर्भाव के लिये शास्त्रों में संस्कारों का विधान किया गया है। संस्कार का अर्थ है दोषों का परिमार्जन । संस्कार मनुष्य के दोषों को परिमार्जित कर उसे धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष रूप पुरुषार्थों के योग्य  बनाते हैं। शबर स्वामी ने संस्कार शब्द का अर्थ बताते हुये कहा है –  “संस्कारो नाम स भवति, यस्मिन् जाते पदार्थो  भवति योग्यः कश्चिदर्थस्य” । अर्थात् संस्कार उसे कहते हैं , जिसके सम्पन्न होने से  कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य बन जाता है। तन्त्रवार्तिककार कुमारिल भट्ट ने भी संस्कारों को परिभाषित किया है। उनके अनुसार  जो क्रियायें तथा विधियाँ किसी कर्म की योग्यता प्रदान करती हैं  , उन्हें संस्कार कहते हैं – योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्कार इत्युच्यन्ते ।  मेदिनी कोश के अनुसार संस्कार शब्द के तीन अर्थ हैं – प्रतियत्न, अनुभव, मानसकर्म । काशिकावृत्ति में “ उत्कर्षाधानं संस्कारः” कहा गया है ।

 इस प्रकार कहा जा सकता है कि संस्कारों के माध्यम से समाज अपने जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखता है तथा  उनके प्रति सदैव निष्ठावान् बना रहता है।

 

    संस्कार हमारे जीवन के विभिन्न  पक्षों को आलोकित करता है । हमारे दोषों को दूर कर हमारे अन्तःकरण में   गुणों का आधान करता है। इसप्रकार दोषमार्जन और गुणाधान करता हुआ संस्कार  हमारी कमियों को दूर करता  है । कतिपय विद्वान् संस्कारों  के दो प्रयोजन मानते हैं – १- दोषापनयन तथा २- गुणाधान । किन्तु विद्वानों का एक वर्ग  उसके तीन प्रयोजन मानता है – १- दोषमार्जन, २- अतिशयाधान तथा ३- हीनाङ्गपूर्ति (संस्कारप्रकाश, पृ. १३) ।  सारांशतः संस्कारों को इस प्रकार समझा जा सकता है – जिस प्रकार खान से निकलने के बाद भी कोई रत्न संस्कार के अनन्तर ही तेजस्विता और  अपना वास्तविक मूल्य प्राप्त करता है , उसी प्रकार मानव भी संस्कारों से तेजस्विता आदि प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाता है। संस्कार  हमारे जीवन के अशुभ प्रभावों को दूर करते हैं तथा हमें विभिन्न प्रकार की लौकिक एवं आध्यात्मिक शक्तियाँ  प्रदान करते हैं।

भारुचि के अनुसार उपनयन संस्कार का अर्थ है “ब्रह्मचारी को शिक्षा के लिये गुरु के पास ले जाना” – उप समीपे आचार्यादीनां बटोर्नयनं प्रापणम् उपनयनम्। कतिपय आचार्य इस संस्कार को अत्यन्त व्यापक मानते हैं। जिस संस्कार के द्वारा बलक को गुरु, वेद, यम, नियम का व्रत और देवता के सामीप्य के लिये दीक्षा दी जाती थी, वह उपनयन है –

गुरोर्व्रतानां वेदस्य यमस्य नियमस्य च ।

देवतानां समीपं वा येनासौ नीयते द्विजः॥

              आचार्य का चयन करने के बाद एक मण्डप में समस्त विधिविधान किये जाते थे। गणेश  आदि देवताओं की पूजा के अनन्तर उपनयन की पूर्वरात्रि को बालक के शरीर में हल्दी के द्रव का लेप किया जाता था । उसकी शिखा में चाँदी की अँगूठी बाँध दी जाती थी। उस रात बालक पूर्णतः मौन रहता था। यह विधि उसके द्वितीय जन्म की प्रतीक थी। हल्दी का लेप गर्भ का वातावरण प्रस्तुत करता था तथा पूर्ण मौन उसके भ्रूणत्व का प्रतीक था । यह माना जाता था कि आचार्य ने  ब्रह्मचारी को पुनः जन्म प्रदान किया है। दूसरे दिन माता पिता तथा पुत्र एक साथ भोजन करते थे। भोजन के पश्चात् बालक को मण्डप में ले जाया जाता था, वहाँ मुण्डन के पश्चात् उसे स्नान कराया जता था। तदनन्तर वह कौपीन धारण कर अपने आचार्य के पास जात था और उससे ब्रह्मचारी बनने की इच्छा व्यक्त करता था । आचार्य उसे उत्तरीय प्रदान करते हुये उसे ब्रह्मचारी के रूप में स्वीकार करता था।

                   आचार्य ब्रह्मचारी को मेखला, यज्ञोपवीत, अजिन तथा दण्ड आदि प्रदान करता था  तथा  अन्य अनेक कर्मकाण्ड सम्पन्न कराने के बाद उसे सावित्री मन्त्र का उपदेश देता था । ब्रह्मचारी त्रिरात्रव्रत सम्पन्न करने के अनन्तर भूमि में शयन करता था, इस क्रिया से उसमें मेधाजनन की विधि सम्पन्न की जाती थी। शास्त्रों में उपनयन संस्कार की विधि अतिविस्तार से बतायी गयी है। गुरुकुल में ब्रह्मचारियों का जीवन भिक्षाटन पर आश्रित होता था । शिक्षा के समय ब्रह्मचारी समाज पर आश्रित  होता था। बटु के शिक्षा  के समय भोजन आदि की व्यवस्था समाज करता था । उसके माता – पिता का यह दायित्व नहीं था । ब्रह्मचर्य आश्रम में राजकुमार और सामान्य बटु एक समान रहते थे ।  यह संस्कार आठ वर्ष की आयु में या उसके बाद किया जाता था। आश्रम में निवास करता हुआ बटु अनेक विद्याओं का अध्ययन करता था ।संस्कारों के माध्यम से समाज अपने जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखता है तथा  उनके प्रति सदैव निष्ठावान् बना रहता है। शिक्षा भी उपनयन संस्कार से आरम्भ होती थी और बटु शिक्षा ग्रहण करने के लिये गुरु के आश्रम चला जाता था। वह वहाँ से  स्नातक बनकर ही वापस गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था । इस अवधि में गुरु उसे जीवन जीने की कला सिखा देता था ।

 आज भी शिक्षक का वही महत्त्व है जो प्राचीन काल में था । समय के साथ शिक्षा के  क्षेत्र में कुछ परिवर्तन अवश्य हुये हैं । अब हम आश्रम न जाकर किसी नगर या महानगर में रह कर शिक्षा ग्रहण करते हैं लेकिन शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुयी । शिक्षक के अभाव में शिक्षा की कल्पना ही नहीं की जा सकती । वस्तुतः शिक्षक अपने अनुभव के आधार पर अपने शिष्य के अन्तःकरण में अपने ज्ञान को स्थापित करता है, वह अपने ज्ञान को शिष्य में उतारता है, वह ज्ञान के रूप में अपने शिष्य के हृदय में निवास करता है, उसे आगे बढ़ाता है तथा अपने से भी अच्छा बनाता है किन्तु उससे  उस ज्ञानराशि को कभी वापस लेने का दावा नहीं करता । इसलिये हम अपने आप को सर्वदा अपने गुरु का ऋणी मान कर उसके प्रति नतमस्तक रहते हैं । हमार्रे माता –पिता हमें संसार में लाते हैं किन्तु गुरु हमें परिमार्जित कर कर निर्मलता प्रदान करता है । उसी निर्मलता से हम समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं और अच्छे नागरिक बनते हैं ।

शिक्षक की भूमिका का निर्वाह अति कठिन होता है ।  इसलिये वाल्मीकि, वशिष्ठ और कण्व जैसे महान् तपस्वियों ने शिक्षक की भूमिका भी अपनायी । अपने आश्रमों में उन्होंने शिष्यों को शिक्षा दी । जिस प्रकार शिष्य के लिये  शिक्षक का महत्त्व है उसी प्रकार शिक्षक के लिये शिष्य भी महत्त्वपूर्ण  होता है । शिक्षक  एक होकर भी अपने शिष्यों के माध्यम से अनेक बनता है  और समाज के विकास में अपना योगदान देता है ।

महान् दार्शनिक और शिक्षाविद् सर्वपल्ली  राधाकृष्णन् का जन्मदिन हमें अपने अतीत से जोड़ता भी है और गुरु या शिक्षक के प्रति सम्मान की भावना रखने की शिक्षा भी देता है । यह दिन गुरु और शिष्य के सम्बन्धों  की सहस्राब्दियों से चली आ रही परम्परा का सुदृढ़ सूत्र है ।

 
 
 
प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय
आचार्य, साहित्य विभाग

केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, गोपालपुरा बाई –पास ,  त्रिवेणी नगर ,जयपुर

Leave your thought here

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select the fields to be shown. Others will be hidden. Drag and drop to rearrange the order.
  • Image
  • SKU
  • Rating
  • Price
  • Stock
  • Availability
  • Add to cart
  • Description
  • Content
  • Weight
  • Dimensions
  • Additional information
Click outside to hide the comparison bar
Compare
Alert: You are not allowed to copy content or view source !!