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प्रोफेसर सुरजनदास स्वामी

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प्रोफेसर सुरजनदास स्वामी


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आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर

स्वनामधन्य स्वामी सुरजन दास जी का जन्म ग्राम जैजूसर जिला झुंझुनू में एक कृषक परिवार में हुआ था। आप कुटुम्ब परम्परा अनुसार जाट परिवार से थे तथा आपका गोत्र ऐचरा था। आपके परिवार का जमात उदयपुर वाटी जो कि जिला झुंझुनू में स्थित है, प्राय: आना जाना रहता था। जमात उदयपुर वाटी के दादूपंथी नागा सम्प्रदाय के संत पंच गीधाराम जी स्वामी से आपके परिवार का अच्छा सम्पर्क था। जमात उदयपुरवाटी के अखाड़ा महन्त मनीराम जी महाराज के परिवार से सम्बन्धित पंच गीधाराम जी महाराज की बहुत प्रतिष्ठा थी। श्री गीधाराम जी स्वामी की ख्याति व प्रतिष्ठा को देखते हुए स्वामी जी के माता पिता द्वारा श्री सुरजन दास जी को बाल्यावस्था में ही उनका शिष्य बना दिया गया। पंच गीधाराम जी स्वामी सुयोग्य बालक को पा कर अति प्रसन्न हुए तथा स्वामी जी को विद्या अध्ययन हेतु श्री दादू महाविद्यालय में प्रवेश दिला दिया।

            श्री दादू संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना महामनीषी वैद्य स्वामी लक्ष्मीराम जी महाराज द्वारा देवभाषा संस्कृत की शिक्षा एवं प्राच्य विद्याओं का ज्ञान संत समाज एवं समस्त वर्ग के लोगों को प्राप्त हो, इसी उद्देश्य को लेकर की गयी थी। वैद्य स्वामी लक्ष्मीराम जी महाराज तत्कालीन समय के लब्धप्रतिष्ठित चिकित्सक थे। वे आमजन के अतिरिक्त राजा-महाराजा व उच्चवर्ग के भी चिकित्सक थे।

            श्री दादू महाविद्यालय के संचालन का कार्यभार त्यागमूर्ति वैद्य श्री लक्ष्मीराम जी महाराज द्वारा श्री मंगल दास जी महाराज को दिया गया था। स्वामी श्री सुरजनदासजी के प्रथम शिक्षागुरु त्यागमूर्ति तपोनिष्ठ स्वामी श्री मंगलदास जी महाराज ही थे। स्वामी जी प्रारंभ से ही मेधावी छात्र थे। होनहार विद्यार्थी होने के कारण सभी शिक्षकों का आप पर विशेष ध्यान रहता था। आपने सभी परीक्षायें प्रथम श्रेणी एवं प्रथम स्थान से उत्तीर्ण की थीं।  आपमें भारतीय धर्म व संस्कृति के प्रति अत्यधिक आस्था विद्यमान थी, अत: आपने देवभाषा संस्कृत की अनेक विधाओं जैसे वेद, वेदान्त, साहित्य, व्याकरण, दर्शन, मीमांसा आदि का व्यापक अध्ययन किया।

            त्यागमूर्ति श्री मंगलदास जी स्वामी की प्रेरणा से आपने विशिष्ट ज्ञानार्जन के उद्देश्य से वाराणसी जाना स्वीकार किया। वाराणसी में कुछ वर्षों तक आपने श्री दादू मठ में निवास करते हुए वहाँ के प्रकाण्ड विद्वानों से भी विद्या अध्ययन किया। जब आप जयपुर लौटे तो आपकी प्रतिभा एवं ज्ञान की ख्याति चहुँ दिशाओं में फैली। स्वामी जी दादूपंथी समाज में ‘‘शास्त्री जी’’ के नाम से सुविख्यात थे। तभी आपका साक्षात्कार वेद वाचस्पति पं. मधुसूदन जी ओझा से हुआ, जिन्होंने ब्रिटेन में वेदविज्ञान का प्रसार कर विश्व में ख्याति अर्जित की थी। आपने ओझा जी को अपना वेद – गुरु बनाया तथा चार वर्षों तक उनके शिष्यत्व में वेदविज्ञान का गहन अध्ययन किया। स्वामी जी राजकीय सेवा में तथा तत्पश्चात् जोधपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत संकाय के विभागाध्यक्ष रहते हुए भी वेदविज्ञान के अनुसंधान में निरंतर लगे रहे। श्री दादू सम्प्रदाय के सिद्धान्तों के प्रचार प्रसार में भी आप उल्लेखनीय योगदान देते रहे।

            दादू सम्प्रदाय के सिद्धान्तों, नियमों एवं परम्परा इत्यादि कार्यों के प्रचार-प्रसार में दादूपंथी नागा सम्प्रदाय के प्रमुख महन्त श्री रामप्रसाद दासजी महाराज, दादूद्वारा रामगंज, जयपुर से भी स्वामी जी को पर्याप्त सहयोग मिला। आपने ज्ञान के भावी विकास की नींव सुदृढ करने के उद्देश्य से वेद इत्यादि संस्कृत ग्रंथों का सम्पादन एवं प्रकाशन कर उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किये। वेदविद्वान् महामण्डलेश्वर श्री गंगेश्वरानन्द जी महाराज तथा वेदमनीषी श्री कर्पूरचंद जी कुलिश राजस्थान पत्रिका संस्थापक भी आपके प्रशंसक थे। इनके साथ रहते हुए आपने ओझा जी के अनेक ग्रंथों का सानुवाद सम्पादन किया व चतुर्वेद पर एक प्रामाणिक ‘शब्द वेद’ विपुलकाय ग्रंथ का निर्माण किया। इसी के साथ श्री दादूवाणी की भूमिका लिख कर आपने श्री दादू जी महाराज के सिद्धान्तों को विश्वव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

            आपके द्वारा लिखित श्री दादू वाणी की भूमिका, श्रीदादू जी महाराज के सिद्धान्तों को प्रतिपादित करते हुए अन्य धर्मग्रंथों से दादूवाणी का सामञ्जस्य स्थापित करती है, जो अति प्रशंसनीय है। सेवानिवृत्ति के पश्चात् स्वामीजी ने काषाय वस्त्र धारण कर लिये थे तथा अपने कार्यक्षेत्र का भी विस्तार कर लिया था। वे विभिन्न स्थानों पर जाकर श्री दादूवाणी तथा अन्य दिव्यग्रंथों के बारे में आमजनों को व्याख्यान व प्रवचन देते थे। इस प्रकार उनका मुख्य उद्देश्य इन धार्मिक ग्रथों से जनसाधारण को अवगत करवाना था। इसके लिए स्वामी जी चातुर्मास का आयोजन भी करते थे, ताकि अधिक से अधिक लोग इन आयोजनों से जुडक़र ज्ञानार्जन कर लाभान्वित हो सकें। स्वामी जी ने यह क्रम अपने देहावसान तक निरन्तर जारी रखा। सही अर्थों में वे संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के पुरोधा एवं पोषक थे।

दादू वाणी पर कुछ लिखने के लिए अत्यन्त अध्ययन मनन व परिशीलन अपेक्षित है, तभी उस पर साधिकार लिखा जा सकता है। यह सर्वविदित है कि स्वामी सुरजनदासजी का श्री दादूवाणी पर भी गहन अध्ययन था। वे प्रात: स्मरणीय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोकहित, संस्कृतसेवा व मानवसेवा को समर्पित कर दिया था। स्वामी जी के लोकहितकृत्यों के प्रति समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा।

डॉ. दयाराम स्वामी

(लेखक एवं विचारक)

एम.बी.बी.एस. एम.डी. (स्वर्णपदक)

वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ एवं पूर्व प्रमुख विशेषज्ञ

एस.एम.एस. हॉस्पिटल, जयपुर

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