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आयुर्वेदमार्तण्ड स्वामी श्री लक्ष्मीराम भिषगाचार्य

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आयुर्वेदमार्तण्ड स्वामी श्री लक्ष्मीराम भिषगाचार्य


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आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर

आचार्य चरक का एक वाक्य है कि “बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुने: अर्थात् कोई भी आचार्य अपने शिष्यों को यदि उपदेश प्रदान करता है तो उनके उपदेश में किसी प्रकार  का अन्तर नहीं होता, सब शिष्यों को वे एक समान रूप से उपदेश देते हैं लेकिन इस उपदेश को ग्रहण करने वाले शिष्य उत्कृष्ट  बुद्धि, मध्य बुद्धि एवं अल्प बुद्धि इस प्रकार से तीन प्रकार के होते हैं, अतः वे उस उपदेश को अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार गृहीत करते हैं । ऐसी ही एक विभूति आयुर्वेदमार्तण्ड स्वामी श्री लक्ष्मीराम जी हुए हैं जो प्रवर बुद्धि वाले थे । अपने गुरु  से अन्य सहपाठियों के साथ ही सामान्य रूप से ज्ञान लेते हुए भी वे विशिष्ट थे ।जिन्होंने अपने गुरु से गृहीत ज्ञान को विशेष रूप से सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसारित किया ।

 जयपुर में रहते हुए आयुर्वेदीय  शिक्षा एवं चिकित्सा का सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रसार करने वाले  स्वामी श्री लक्ष्मीराम का जन्म जयपुर के पास एक छोटे से गाँव मांग्यास में हुआ जो कि वर्तमान काल में मानसरोवर कॉलोनी के पास ही नारायणविहार नामक कॉलोनी में समाहित है। इनके पिता जी का नाम पंडित भूरामल था । इनका जन्म श्रावण कृष्णा 6 मंगलवार संवत् 1930 (सन् 1873 ईस्वी ) में हुआ । इन्होंने 7 वर्ष की उम्र में ही दादूसम्प्रदाय  के साधु श्री चंदन दास जी से संवत् 1937 (सन् 1880 ईस्वी) में दीक्षा ग्रहण कर ली थी। उस समय जयपुर एवं इसके आसपास के क्षेत्र में दादूसम्प्रदाय  एक प्रतिष्ठित एवं अधिसंख्य स्वरूप के प्रभावी सम्प्रदाय  के रूप में प्रसिद्ध था । चंदनदास जी के पास दीक्षा लेने के बाद विभिन्न स्तरों पर प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद इन्होंने महाराज संस्कृत कॉलेज जयपर में विधिवत् संस्कृतशिक्षा ग्रहण करते हुए जब मध्यमा के स्तर पर आए तो उस समय इन्होंने आयुर्वेद को विशिष्ट विषय के रूप में चयनित किया । उस समय महाराज संस्कृत कालेज में वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, दर्शन आदि विभिन्न विषयों के पृथक्  पृथक्  विभाग थे।  उन्हीं में आयुर्वेद का भी एक विभाग था जो बाद में सन् 1940 में आयुर्वेद महाविद्यालय के रूप में पृथक्श: स्थापित किया गया ।  यही प्रसिद्ध महाविद्यालय 17 फरवरी 1976 को राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान और अब 9 नवंबर 2020 से मानद विश्वविद्यालय के रूप में जयपुर में संस्थित है ।

 

 उस काल में महाराज संस्कृत कालेज के आयुर्वेदविभाग में श्री कृष्णराम जी भट्ट विभागाध्यक्ष थे जो कि संस्कृत एवं आयुर्वेद के उद्भट विद्वान्  थे । वहाँ  पर उस विभाग में स्वामी लक्ष्मीराम जी ने भिषग्वर परीक्षा उत्तीर्ण की, जोकि शास्त्री के समकक्ष थी।  ये अत्यन्त  ही मेधावी छात्र थे अतः जयपुर राज्य के तत्कालीन शिक्षा विभाग के अध्यक्ष ने विशेष रूप से इस विभाग को आचार्य के विभाग के रूप में क्रमोन्नत किया, जहाँ  से स्वामी लक्ष्मीराम जी ने भिषगाचार्य की उपाधि सन् 1895 ईस्वी में प्राप्त की । उस समय महाराज संस्कृत कॉलेज में किसी भी विषय में आचार्य की उपाधि प्राप्त करने वाले स्वामी लक्ष्मीराम जी प्रथम व्यक्ति थे । 

यह उपाधि प्राप्त करने के बाद वे 2 वर्ष तक अपने गुरु श्री कृष्णराम जी भट्ट के साथ आयुर्वेद का प्रायोगिक अभ्यास करने लगे साथ ही भट्ट जी के द्वारा लिखी गई सिद्ध भेषज मणिमाला नामक पुस्तक पर  टिप्पणीलेखन का कार्य भी किया । दुर्भाग्य से श्री भट्ट जी का देहावसान अल्पायु में ही 1897 ईस्वी में हो गया अतः इनके स्थान पर अगस्त 1897 ईस्वी में स्वामी लक्ष्मीराम जी की नियुक्ति इस कॉलेज के आयुर्वेद विभाग में आयुर्वेदाध्यापक के रूप में हुई, जहाँ पर अनेक शिष्यों को अध्यापन करवाते हुए सन् 1933 ईस्वी में राज्यसेवा से अवकाश ग्रहण किया । इन्होंने लगभग 36 वर्ष तक आयुर्वेद के अध्यापन का कार्य किया ।

 स्वामी जी के अध्यापन के कार्यकाल में उनकी विद्वत्ता की कीर्ति सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैली हुई थी अतः बंगाल, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मुल्तान आदि भिन्न-भिन्न स्थानों से अनेक छात्र इनके पास आयुर्वेद का अध्ययन करने के लिए आए । इनके शिष्यों ने भी अपने अपने क्षेत्र में अत्यन्त  ही प्रसिद्धि प्राप्त की ।

 उस समय सन् उन्नीस सौ सात में भारतवर्ष में अखिल भारतीय आयुर्वेद महासम्मेलन के नाम से वैद्यों के एक विशिष्ट संगठन की स्थापना हुई जिसका अध्यक्ष होना अत्यन्त  ही गौरव की बात थी । इस आयुर्वेद महासम्मेलन के छठे अधिवेशन के अध्यक्ष स्वामी श्री लक्ष्मीराम जी को चुना गया था । इसका छठा अधिवेशन 1914 में कोलकाता में हुआ जिसमें उन्होंने अपना भाषण संस्कृत भाषा में दिया जो आज भी एक प्रसिद्ध भाषण के रूप में संग्रहीत है ।

 स्वामी जी चिकित्सा में भी अत्यन्त  दक्ष थे वे केवल जयपुर में ही नहीं अपितु चिकित्सा के लिए सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रसिद्ध थे । इनके पास दूर-दूर से लोग चिकित्सा के लिए आया करते थे । राजा-महाराजा, सामंत एवं जागीरदार इनसे चिकित्सा लिया करते थे । उस समय जयपुर से बाहर भी रोगियों को देखने के लिए इन्हें बुलाया जाता था तब  बाहर जाने की इनकी प्रतिदिन की फीस ₹1000 हुआ करती थी, वह फीस जयपुर से रवाना होकर गंतव्य स्थान पर पहुंचने और वापस आने तक लगने लगने वाला सम्पूर्ण समय 2 दिन 3 दिन या 4 दिन जितना भी होता था उसके अनुसार यह फीस हुआ करती थी । यह इनकी प्रसिद्धि को द्योतित करने वाला प्रसंग है । वे केवल  राजा-महाराजाओं, सेठ-साहूकारों आदि धनवान् व्यक्तियों से ही फीस लिया करते थे अन्यथा जयपुर में जहाँ  स्वामी लक्ष्मीराम जी  अपने बाग में बैठकर यह चिकित्सा किया करते थे वहाँ  गरीब रोगियों से फीस नहीं लेते थे अपितु बहुत से रोगियों से औषधियों का मूल्य भी नहीं लिया करते थे। जयपुर में मोती डूंगरी रोड पर यह  बाग आज भी स्वामी लक्ष्मीराम जी का बाग के नाम से प्रसिद्ध है ।

 

 इन्होंने सन् 1919 में धन्वन्तरि  औषधालय की स्थापना जौहरी बाजार जयपुर में की जो आज भी इनकी यशोगाथा के रूप में प्रतिष्ठित है ।यहीं पर 1922 ई. में धन्वन्तरि  फार्मेसी की स्थापना की जो आज भी श्रेष्ठ औषधियों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है । सन् 1920 ई. में दादू संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना भी इनके सत् प्रयासों से हुई।   धन्वन्तरि  औषधालय और दादू संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना में इन्होंने अपनी ओर से पर्याप्त धनराशि भी प्रदान की तथा  अपने प्रभाव से अन्य प्रतिष्ठित लोगों से भी धनसंग्रह कर इन के  सम्यक् संचालन की व्यवस्था की । राज्यसेवा से निवृत्त होने के बाद इन्होंने सन 1934 में अपने स्वयं के द्वारा अर्जित धन में से अधिकांश राशि से एक ट्रस्ट की स्थापना की जो स्वामी लक्ष्मीराम ट्रस्ट के रूप में आज भी प्रतिष्ठित है ।

इस महान् विभूति का स्वर्गवास 66 वर्ष की उम्र में श्रावण कृष्णा अष्टमी संवत् 1996 ( सन् 1939 ईस्वी) में हुआ। इनके श्रेष्ठ कार्यों को आज भी न केवल जयपुर में याद किया जाता है अपितु सम्पूर्ण भारत वर्ष में आयुर्वेद के क्षेत्र में प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञों के इतिहास में इनको महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है । स्वामी लक्ष्मीराम ट्रस्ट के द्वारा प्रतिवर्ष इनका निर्वाण दिवस आयुर्वेद एवं संस्कृत के विद्वानों की उपस्थिति में आयोजित किया जाता है जिस में इन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है । इस वर्ष इनका 84 वाँ निर्वाण दिवस 21 जुलाई 2022 को है ।

(म.म. राष्ट्रपतिसम्मानित) प्रो. वैद्य बनवारी लाल गौड़

भिषगाचार्य, आयुर्वेद-बृहस्पति, पीएच.डी. (आयुर्वेद),
एम.ए. (संस्कृत), डिप्लोमा इन जर्मन
पूर्व निदेशक – राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर
पूर्व कुलपति – डॉ. एस. राधाकृष्णन् राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान
80, चंबल मार्ग, सेन कॉलोनी, प्रेम नगर, झोटवाड़ा जयपुर

Comments (6)

  1. Dr. Daya ram swami

    Excellent👏

    1. राजेंद्र कुमार शर्मा,झोटवाड़ा,जयपुर

      राष्ट्रपति महोदय द्वारा सम्मानित प्रोफेसर श्री बनवारी लाल जी गौड़ साहब का यह ज्ञान वर्धक लेख इतने सरल और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है की आसानी से हम गैर संस्कृत भाषी को भी आसानी से समझ में आता है। सरल हिंदी भाषा में, ग्रंथों और अनेक विद्वानों के संदर्भ के साथ इतिहास के कालक्रम में व्याख्या में विषय को बहुत अच्छे तरीके से समझाया गया । सरल हिंदी में व्याख्या से उल्लेखित संस्कृत श्लोकों को भी पढ़ने और समझने में बहुत मदद मिली। हमारा ज्ञान वर्धन तो हुआ ही साथ में पूरे लेख को पढ़ने में आनंद की अनुभूति भी हुई है।
      ऐसे उत्कृष्ट लेख सौभाग्य से और यदा कदा ही पढ़ने को मिलते हैं।

      EXCELLENT

      राजेंद्र कुमार शर्मा, झोटवाड़ा, जयपुर।

  2. डा गिर्राज प्रसाद शर्मा

    मेने भी 1977से1983 तक आयुर्वेद का अध्ययन किया था

  3. Dr. Anil SHARMA

    Excellent 👍👍

    1. राजेंद्र कुमार शर्मा,झोटवाड़ा,जयपुर

      राष्ट्रपति महोदय द्वारा सम्मानित प्रोफेसर श्री बनवारी लाल जी गौड़ साहब का यह ज्ञान वर्धक लेख इतने सरल और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है की आसानी से हम गैर संस्कृत भाषी को भी आसानी से समझ में आता है। सरल हिंदी भाषा में, ग्रंथों और अनेक विद्वानों के संदर्भ के साथ इतिहास के कालक्रम में व्याख्या में विषय को बहुत अच्छे तरीके से समझाया गया । सरल हिंदी में व्याख्या से उल्लेखित संस्कृत श्लोकों को भी पढ़ने और समझने में बहुत मदद मिली। हमारा ज्ञान वर्धन तो हुआ ही साथ में पूरे लेख को पढ़ने में आनंद की अनुभूति भी हुई है।
      ऐसे उत्कृष्ट लेख सौभाग्य से और यदा कदा ही पढ़ने को मिलते हैं।

      EXCELLENT

      राजेंद्र कुमार शर्मा, झोटवाड़ा, जयपुर।

  4. राजेंद्र कुमार शर्मा,झोटवाड़ा,जयपुर

    यद्धपि संस्कृत तृतीय विषय के रूप में कक्षा 6 से 10 तक पढ़ी और वह भी चार दशकों से अधिक समय के बाद स्मृति में नहीं है तथापि महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा सम्मानित प्रोफेसर श्री बनवारी लाल जी गौड़ साहब का यह ज्ञान वर्धक लेख इतने सरल और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है की आसानी से गैर संस्कृत भाषा को भी आसानी से समझ में आता है। सरल हिंदी भाषा में और ग्रंथों विद्वानों के संदर्भ के साथ इतिहास के कालक्रम में विषय को बहुत अच्छे से समझाया गया कि संस्कृत में लेख में उल्लेखित संस्कृत श्लोकों को भी पढ़ने और समझने में मदद मिली और हमारा ज्ञान वर्धन तो हुआ ही साथ में पूरे लेख को पढ़ने में आनंद की अनुभूति भी हुई। यह लेख अब तक तीन बार पड़ने के बाद भी पढ़ने की भूख मिटी नहीं है।। बार बार पढ़ने,समझने और ज्ञान वर्धन का मन करता है।।
    राजेंद्र कुमार शर्मा, झोटवाड़ा, जयपुर।

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