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स्‍वतन्‍त्रता सेनानी ठाकुर कुशाल सिंह चाँपावत

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स्‍वतन्‍त्रता सेनानी ठाकुर कुशाल सिंह चाँपावत

Kushal Singh

राजस्‍थान में 1857 के क्रान्तिकारियों में सक्रिय रूप से भूमिका निभाने वाले उल्‍लेखनीय स्‍वतन्‍त्रता सेनानी ठाकुर कुशाल सिंह चाँपावत मारवाड़ रियासत के आउवा नामक स्‍थान के जागीरदार थे। भारतीय स्‍वतन्‍त्रता हेतु 21 अगस्‍त 1857 को आबू में हुए विद्रोह का दमन करने के उद्देश्‍य से जोधपुर लीजियन को एरिनपुरा छावनी से भेजा गया था। इस टुकड़ी में क्रान्तिकारी विचारधारा से प्रभावित सेनानी मोती खाँ, सूबेदार शीतलप्रसाद एवं तिलकराम ने दमन के बजाय विद्रोह में प्रत्‍यक्ष रूप से भाग लेकर विद्रोह को और प्रबल बना दिया तथा बाद में सभी सैनिक एवं क्रान्तिकारी आबू से एरिनपुरा छावनी आये। उन्‍होंने एरिनपुरा छावनी को बुरी तरह लूटखसोट कर तहस नहस कर दिया। सभी क्रान्तिकारियेां ने ‘चलो दिल्‍ली मारो फिरगी’ का नारा लगाते हुए दिल्‍ली की ओर कूच किया। 

     जब क्रान्तिकारियों का जत्‍था आउवा पहुँचा तो ठाकुर कुशाल सिंह का हृदय गर्वान्वित हो राष्‍ट्ररक्षार्थ प्रसन्‍नता से भर गया । ठाकुर कुशाल सिंह ने अपना सफल नेतृत्‍व प्रदान कर क्रान्तिकारियों के उत्‍साह को चरमोत्‍कर्ष प्रदान करने का कार्य किया। जोधपुर के तत्‍कालीन महाराजा तख्‍तसिंह ने ब्रिटिश रेजीडेन्‍सी (पश्चिमी राजपूताना रेजीडेन्‍सी, जोधपुर) के आदेश की अनुपालना में अपनी सेना को कैप्‍टन हीथकोट की सेना के साथ विद्रोह के दमन हेतु भेजा। कुशाल सिंह के नेतृत्‍व में क्रान्तिकारियों ने बिठोडा में सेना का डट कर मुकाबला किया तथा ब्रिटिश सेना को पराजित करने में सफलता प्राप्‍त की। क्रान्तिकारियों ने जोधपुर नरेश की सेना के सेनापति ओनाडसिंह पँवार तथा ब्रिटिश सैनिक टुकडी के कैप्‍टन हीथकोट को मौत के घाट उतार दिया। फौजदार राजमल लोढा अपनी जान बचाकर भाग गया। राजस्‍थान के इतिहास में यह युद्ध बिठोड़ा के युद्ध के नाम से जाना जाता है।

     बिठोड़ा के युद्ध में पराजय के बाद राजपूताना के तत्‍कालीन ए.जी.जी. पैट्रिक लारेंस अपनी सेना लेकर क्रान्तिकारियों के दमन हेतु आउवा पहुँचे। पोलीटिकल एजेन्‍ट मॉकमैसन भी लारेंस के साथ ही थे। विद्रोही क्रान्तिकारियों का उत्‍साह अपनी चरमसीमा पर था। 18 सितम्‍बर 1857 को चेलावास नामक स्‍थान पर लारेंस की सेना का क्रान्तिकारियों के साथ भंयकर संघर्ष हुआ। इस युद्ध में लारेंस की सेना भी पराजित हुई। भारतीय स्‍वातन्‍त्र्य वीरों ने पो‍लीटिकल एजेन्‍ट मॉकमैसन का सिर काट कर आउवा के किले पर लटका दिया। यह युद्ध भी निर्णायक युद्ध रहा। इसे गोरा काला का युद्ध भी कहा जाता है।

     इस युद्ध के परिणामस्‍वरूप ब्रिटिश शासन अत्‍यन्‍त चिन्‍ताग्रस्‍त हो गया। तत्‍कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने कर्नल होम्‍स के नेतृत्‍व में पुन: ब्रिटिश सैनिक टुकडी आउवा भेजी। 20 जनवरी 1858 को हुए युद्ध में क्रान्तिकारियों को पराजय का मुख देखना पड़ा। 23 जनवरी 1858 की रात्रि को कुशालसिंह ने किले की जिम्‍मेदारी अपने छोटे भाई पृथ्‍वीसिंह को दी तथा स्‍वयं यहां से भाग निकले। 24 जनवरी 1858 को  आउवा पर अंग्रेजों का आधिपत्‍य हो गया । क्रान्तिवीर ठाकुर कुशाल सिंह मारवाड़ में लूटमार करते हुए मेवाड़ चले गए। उन्‍होंने सलूम्‍बर के ठाकुर जोधसिंह रावत के यहाँ शरण प्राप्‍त की ।

     मेवाड़ चले जाने पर भी अंग्रेजों ने कुशालसिंह का पीछा नहीं छोडा। कुशालसिंह क्रान्ति की आग को भड़काते रहे । वे जहॉ जहॉ भी जाते, वहॉ अपने विचारों से जनता को देश की आजादी के लिए जागरूक करते । 8 अगस्‍त 1860 को नीमच में क्रान्तिवीरों को सम्‍बोधित करते समय ब्रिटिश सैनिकों द्वारा आपका घेराव कर लिया गया। विवशता की स्थिति में आपने आत्‍मसमर्पण कर दिया।आप पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा मेजर टेलर की अध्‍यक्षता में एक जॉच कमीशन भी गठित किया गया, जो निरन्‍तर जॉच करता रहा । 10 नवम्‍बर 1860 को टेलर कमीशन ने ठाकुर कुशाल सिंह को गवाहों के अभाव में निर्दोष सिद्ध किया, अत: कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर उन्‍हें राजद्रोह से मुक्‍त कर दिया गया।  

डॉ. रामदेव साहू

द्वारा राजस्‍थान संस्‍कृत अकादमी, जयपुर

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